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कविता : बेबस नारी

बेबस नारी

हर पल घबराती है
डर को अपने में दबाये
जूठी हंसीं दिखती है।

बेबस नारी का हँसना
बहुतों को नही सुहाता है
मन ही मन में बेचारी
बस रोये जाती है।

मर्दों के साये में
उसको घूंघट में ही रहना है
घूंघट में रहते उसे अब
बेपर्दा नही होना है।

राह चलती अकेली नारी
किसी को अच्छी नहीं लगती है
जालिम सी आंखें उनकी
बस घूरती रहती है।

ख़ूबसूरतीं पे उसकी
कई दाग लगाए जाते है
और दहेज की आग में
खूब जलायी जाती है।

घर परिवार को वो अकेले
संभाले रहती है
लफ़्ज जबान पे उफ्फ सा
कभी नही वो रखती है।

दो पाटों के बीच में
पिसती चली वो जाती है
जीवन की अविरल धारा में
बहती चली जाती है।

मुकेश बिस्सा
श्री कन्हैया कुंज, 4नवखुनिया, गांधी कॉलोनी, जैसलमेर
राजस्थान

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