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कविता : कैसे खेलेंगे होली ?

कैसे खेलेंगे होली ?

जब अंतर्मन इतना लहुलूहान है
तब फिर कैसे खेलेंगे होली?

भाई को भाई ना समझा!
क्या बूढ़े? क्या बच्चे?
पशुओं को भी पीछे छोड़ हम,
इंहानियत के खूब उड़ाए परखच्चे!

जब अंतर्मन इतना लहुलूहान है
तब फिर कैसे खेलेंगे होली?

लहु के रंग मे,
अबीर गुलाल बेरंग हो गए!
मिठाई गुझिया के दुकान जल गए!
पिचकारी बनाने वाले हाथ नहीं रहे
अब होली खेलने वाले दोस्त भी तो नहीं रहे!
जब अंतर्मन इतना लहुलूहान है
तब फिर कैसे खेलेंगे होली?

चौक चौराहे गली महल्ले
सब खून से सने हुए हैं
क्या कहें कि आज
गीता कुरान वाले
दोनो ही हाथ खून से रंगे हुए है

जब अंतर्मन इतना लहुलूहान है
तब फिर कैसे खेलेंगे होली?

बेवक्त बेवाओं की सूनी मांगे,
मासूमों के बेरंग आंसू,
सूना घर आंगन रोती देहरी,
दहाड मारकर पूछ रहे हैं।

जब अंतर्मन इतना लहुलूहान है
तब फिर कैसे खेलेंगे होली?

एक दिल था जो बस बच्चा था,
पत्थर खाकर और खिला कर,
पत्थरों के बाजार मे
अपना मानव हृदय भी हम
पत्थर के भावों मे बेच आए हैं

जब अंतर्मन इतना लहुलूहान है
तब फिर कैसे खेलेंगे होली?

फगुनाहट होरी के गीतो की जगह,
रूदाली शुरू करा आए है!
होलिका दहन की जगह ”
अपना प्रहलाद जला आए हैं!

जब अंतर्मन इतना लहुलूहान है
तब फिर कैसे खेलेंगे होली?

कुमुद “अनुन्जया”
भागलपुर( बिहार)
[email protected]

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