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कविता: माटी म्हारे देस री

पिऊं जी थानै हेलो देरही नैणा मं आंसू लाय
घर आओ नी बितया दिन बरस हजार फागुन फूलो आय।
रूठी नैण संगी सहेलियां ओ फागुन म्हानै आय
सूरज चिमके रूलाय पजरे सारै अंग कांटा चुभाय।
बूंद पडै ज्यूं थारी याद आय थै फौजी ना जाणों हिवड़े री
ई गली री बातां आवै याद ज्यूं धरती दुलहिनया बण खिलजाय।
घर आओ नी परदेसिया म्हारो फागुन सूनो जाय
रंग गुलाल खेलिया संग नैणा सुपना बस्या सामी आय।
सावण बरसै बादली ज्यूं पु रवा चालै बयार बताओ
पिऊं जी भादौं कड़कै बिजुली छाय रही म्हारे था बीन अंधियार।
हार न कंगन पहरियां धरती ज्यूं खिल खिल
जाय हूं बी थै आओ ओढूं चूनर हरियाली चाह।
कृष्ण ज्यूं गोपी संग घर आंगन में रास लीला
पिऊं चांद सो सोवणो मुखडो़ बैगों सो दिखा राह।
कब आओंगे देस पिऊं जी नौतूं सारै गांव नै बंदवार
सजाय भारती कोयल गीत फागुन फूला पगडंड़ी पै आय।

मंगल व्यास भारती
गढ़ के पास , चूरू राजस्थान

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