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कविता : मेघा

हे मेघा तुम कहाँ
बरस गए
किसान तेरी आस
जमीं पर ही लेट गए
हे मेघा तुम कहाँ बरस गए
तेरी वजह से ही
बीज पौधे जलकर राख
हो गए
हे मेघा तुम कहाँ बरस गए
तुम बिन सब सुना हो गया
ऑक्सीजन सपना हो गया
दम घुट गई है हर कोने में
फसल आ गई चौगुने से
एक गुने पर
हे मेघा तुम कहाँ बरस गए ।।

मनकेश्वर महाराज “भट्ट”
साहित्यकार , शिक्षक
मधेपुरा , बिहार

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