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कविता : गणतंत्र

गण और तंत्र में
युद्ध जारी है
आज से नहीं
बहुत पहले से
लेकिन
अब कुछ ज्यादा है
फिलहाल गण पर तंत्र भारी है
सबसे बड़ी लाचारी है
तंत्र मौज में गुलछर्रे उड़ा रहा है
और
गण सिर्फ रेंग रहा
बहुत सारे टूटे हुए पैरों के साथ
गिजाई की तरह।।।।

कृष्ण कुमार निर्माण

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