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कविता : वेतन

ये वेतन की कहानी है
जिसकी उम्र बहुत सुहानी है
एक तारीख को आता है
पांच तक बीत जाता है
घिस घिस कर चलना पड़ता है
शेष याद करना पड़ता है
प्राथमिकता किसे देनी है
बाट किसकी जोहनी है
जो बिल पहले आता है
व्यय वोही जब पाता है
अंत में जो आता है
उधारी की राह पाता है
सारी योजनाएं रह जाती है
जब देने की बारी आती है
हम मुँह ताकते रह जाते है
जब जेब में कुछ नही पाते है
पूर्णमासी का चांद अब ये
हफ्ते का ही कहलाता है

मुकेश बिस्सा
जैसलमेर

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