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कविता : एक बार तो देख प्रभु लो

परमपिता हैं आप हमारे, हम सब आपके लाल
आप कभी हैं रामचंद्र और आप कभी गोपाल
ऐसा लगता बना के दुनिया भूल गए हम सबको
एक बार तो देख प्रभु लो इस कलयुग का हाल

समय तो अब हैं काल बन गए और मानव शैतान
भ्रष्ट हो गई बुद्धि सबकी फैल रहा अज्ञान
भूल गए हैं प्रेम भाव सब भूल गए अनुराग
लुप्त हो गया है दुनिया से मानवता का ज्ञान
जकड़े हर मानव को आज है लोभ- मोह का जाल
एक बार तो देख प्रभु लो इस कलयुग का हाल

मात-पिता की कदर नहीं है बहन भाई को भूले
सारे रिश्ते नाते जाकर स्वार्थ के मद में फूले
अपनी पत्नी बेटे बेटी में ऐसे सब हैं खोए
बाप की अंगुली और मां के आंचल को भी हैं भूले
त्याग पिता का और माता की ममता हुई बेहाल
एक बार तो देख प्रभु लो इस कलयुग का हाल

वेष-भूषाएं बदल रहीं हैं जाने क्या है चक्कर
आधुनिकता हुई हावी पश्चिम से आकर हम पर
परिधान अब की दुनिया में हो गए इतने छोटे
पहनो या फिर न पहनो दोनों हैं बात बराबर
छोटे कपड़ों के चलते होता कई बार बवाल
एक बार तो देख प्रभु लो इस कलयुग का हाल

विक्रम कुमार
मनोरा , वैशाली

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