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कविता : बसंत

देखो सखी ! मदमाता बसंत जब आये
दिलों में चहूँओर कैसा उल्लास बिखरायें|
बीत गये है शरद ,शिशिर और हेमन्त ,
सर्दी का बस हुआ अंत ,बसंत ये संदेश लाये
सर्दी, गर्मी और वर्षा का तांडव हुआ बेअसर,
तब महकती बासंती बयार दिल को लुभाये|
ओढ पीत चुनर को धरा जब इठलाती आये,
सरसों के पीत कुसुम से सजी वो दुल्हन सी शर्माये|
विटप आम्र मंजरी गुच्छ से सब भर आयें|
ऋतुराज के स्वागत में भ्रमर गुंजन गुनगुनाये|
हम वाग्देवी का अवतरण दिवस जश्न मनाये,
पीला खाये पहने और देवी को पीला चढाये |
पिक, कोकिल मधुर स्वर में सरगम गाये|
मनमोहनी अवनि का देख नजारा मन झूम झूम जाये,
रति और काम का हुआ अदभूत मिलन ,
हिय भाव स्वयं सरित सा लफ्जों में उमड़ आये |
देखो सखी मदमाता बसंत जब आये ,
अनुभूति चमन में खुशियों की सौंधी महक आये|

सीमा लोहिया
न्यू हाऊंसिंग बोर्ड
कॉलोनी झुंझूनू , (राज.)
पिन -333001 [email protected]

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