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कविता : छब्बीस जनवरी हैं आई

मन पटल पर बनी सलोनी.
सुंदर सी छाया।
सुख  समृद्धि नव जागृति ले.
छब्बीस जनवरी आया।
दुखी न कोई. मस्त सभी.
लिये तिरंगे रंगरलियों में।
गूँजेगे वैभवी तराने.
गाँवों गलियों में।
छोटा  बड़ा नहीं कोई अब.
इसकी ये पहचान लाया।
दीवाना बन हर्ष से.
भर झूमे नाचेगा।
सदा सदा के लिए.
वंदे मातरम गायेगा।
पैशाचिक आसुरी.
वृतियों का न दिखे साया।
महाशक्ति बन व्योम वृत.
पर भारत चमकेगा।
रश्मि विश्व को बाटेगा.
सम भारती दमकेगा।
आरती सजा निज.
तिरंगा फहराया।
छँट जायें छाये जो.
भय के बादल घने।
कटुता रहे न मध्य.
सबके रिश्ते मधुर बने।
नव गणतंत्र अभिनंदन.
नौ निधियाँ दे जाना।
प्रति दिन प्रफुल्लित मन.
यों खुशियाँ दे जाना।
मानव के मानस में.
फिर से सदाचार भर दे।
इस धरती को प्रेम ज्योति से
आलोकित करदे।
विश्व में भारत का.
नंबर वन कर दे।

मंगल व्यास भारती
गड के पास , चूरू [ राजस्थान ]

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