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कविता : पथिक

न कोई संगी न साथी
तू तो पथिक अकेला है
बस चलता चल जीवनपथ पर
यह तो जग का मेला है
कोई थे बचपन के साथी
कोई यार जवानी के
कोई थे वृद्धापन में भी
हैं सब पात्र कहानी के
संबंधों की डोर बंधे सब
कोई गुरु कोई चेला है
बस चलता चल जीवनपथ पर
यह तो जग का मेला है
किसको समझा तूने अपना
यह जग तो एक सपना है
छोड़ दे तू मन की व्याकुलता
कोई यहां नहीं अपना है
ये जीवन बिन बांध बह रहा
एक पानी का रेला है
बस चलता चल जीवनपथ पर
यह तो जग का मेला है
यहां मोह-माया के नाते
उलझ-उलझ रह जाते हैं
कैसे कोई निभाए इनको
ये तो सुलझ न पाते हैं
न सोना न चांदी अपना
सब मिट्टी का ढेला है
बस चलता चल जीवनपथ पर
यह तो जग का मेला है
तेरे बाद यहां पर तेरी
यादें ही रह जाएंगी
धीरे-धीरे वो भी धुंधली
धुंधली होती जाएंगी
यही समझ के जी ले कि
ये जग तो एक झमेला है
बस चलता चल जीवनपथ पर
यह तो जग का मेला है

रंजना मिश्रा
कानपुर, उत्तर प्रदेश

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