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कविता : डरने की जरूरत क्या

यूं मायूस होके आंहें भरने की जरुरत क्या
मोहब्बत जुर्म न कोई है डरने की जरूरत क्या

किसी के भी भरोसे से , दगा कोई नहीं की है
किया बस प्यार है हमने, खता कोई नहीं की है
मुकम्मल इश्क हो जाए मेरा और तुम्हारा ये
इसको छोड़कर रब से, दुआ कोई नहीं की है

मिले जो तुम दुआ कोई और करने की जरूरत क्या
मोहब्बत जुर्म न कोई है डरने की जरूरत क्या

हमें मिलकर जमाने का हरेक संताप सहना है
समय की धार में हरपल हमें चुपचाप बहना है
भूले से गलत राहें कभी चुननी नहीं हमको
किया है प्रेम का ये पुण्य तो निष्पाप रहना है

नदी में भावनाओं की, उतरने की जरूरत क्या
मोहब्बत जुर्म न कोई है, डरने की जरूरत क्या

डरे तो प्यार की खिल्ली उडा़एगा जमाना भी
चारों ओर से बदनाम, कराएगा जमाना भी
कि हमको छोड़ना होगा डरना इस जमाने से
अगर डरते रहेंगे तो डराएगा जमाना भी

किया है प्यार का वादा मुकरने की जरुरत क्या
मोहब्बत जुर्म न कोई है डरने की जरूरत क्या

विक्रम कुमार
मनोरा, वैशाली

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