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कविता : स्त्री जैसा कौन है यहां

स्त्री जैसा कौन है यहां

स्त्री पुरुष इस जहां के,
दो सबसे खूबसूरत फूल।
प्रकृति प्रदत अनमोल जीवन को,
आगे बढ़ा रहे एक दूजे से मिल।
स्त्री खूबसूरत वसुंधरा के समान,
पुरुष अमृत बरसाने वाला आसमान।
स्त्री किसी की मां बहन बहू बेटी,
जिनका सम्मान करें हिंदुस्तानी रीति।
कभी ममता की मूर्ति बनती मदर टेरेसा,
दीन हीन कुष्ठ रोगियों के घाव धोती।
कभी ले हथियार फूलन देवी बनकर,
स्त्री अस्मिता के दोषियों को सबक सिखाती।
कभी कल्पना चावला,कभी संतोष यादव,
हिमालयी चुनौती को कदमों से लांघ देती।
स्त्री जब एक बार कर लेती कोई निर्णय,
किसी कीमत पर अपने वचन से पीछे न होती।
सब त्याग कर सकती,पर होती प्यार की भूखी,
फिर भी स्त्री के जैसा,कौन इस जहां में दुःखी।
घर बाहर हर जगह सह रही अत्याचार स्त्री,
कब ऐसा माहौल बनेगा जब होंगी टेंशन फ्री।

गोपेंद्र कुमार सिन्हा गौतम
देवदत्तपुर दाऊदनगर औरंगाबाद बिहार
व्हाट्सएप नंबर 950 734 1433

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