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सेंटर फॉर पर्सनल डेवलपमेंट संस्था की काव्य गोष्ठी सम्पन्न

विजय न्यूज़ नेटवर्क। डॉ शम्भू पंवार
नई दिल्ली। ‘सेंटर फॉर पर्सनल डेवलपमेंट’ संस्था के तत्वावधान में डिजिटल काव्य गोष्ठी ‘रसतरंगिणी’ का आयोजन किया गया।
गोष्ठी काआरंभ संस्था की संरक्षिका व महिला काव्य मंच की गुरुग्राम की अध्यक्षा श्रीमती दीपशिखा श्रीवास्तव ‘दीप’ द्वारा माँ शारदे के समक्ष दीप प्रज्वलन कर सरस्वती वन्दना के साथ हुआ मुख्य अतिथि के रूप में ‘सोशल एंड मोटिवेशनल ट्रस्ट’ संस्था की अध्यक्षा तथा सुप्रसिद्ध कवयित्री ममता सिंह जी की गरिमामयी उपस्थिति रही,अध्यक्षता गाजियाबाद की मुख्य कोषाधिकारी श्रीमती मनु लक्ष्मी मिश्रा ने की।

गोष्ठी की मुख्य अतिथि प्रख्यात कवयित्री ममता सिंह जी ने बेहतरीन कविता की प्रस्तुति दी।
मौसम की तरह ही वर्तमान भी बदलेगा की आशा जगाई-
यह फूलों का खिलना,
यह कोयल की कूक,
मीठे सपनों के जख्म,
जगा गया है मौसम-
ने गोष्ठी में रंग भर दिया।

मनु लक्ष्मी मिश्रा की कविता ने भाव विभोर कर दिया।
गुजरते लम्हों में सदियाँ तलाश करती हूँ।
प्यास इतनी है कि नदियाँ तलाश करती

दीपशिखा श्रीवास्तव की ग़ज़ल ने सभी के हृदय को छू लिया-
कोई खत,कोई पैगाम, कोई बात तो हो।
काश जिंदगी से, इक रूमानी मुलाकात तो हो।।

अंजू सिंह की कविता:-
चलो आज कुछ अलग काम करते हैं,
यूंयूं ही हम तुम निगाहों में बात करते हैं।

नीरज मल्होत्रा ने कहा:-
मन में लिए वही बात, फिर बीत गयी इक रात।
चाहत में, दो शब्दों की, इक उम्र हुई ख़ाक।।

परिणीता सिन्हा ने कहा-
मैं हूँ इक मोती का आँसू,
लोगों ने मुझे बूँद से आँसू बना दिया’

मान सिंह राठौर की कविता:-
मर गया है आँखों का पानी,
और संवेदना दम तोड़ रही है।

रेखा श्रीवास्तव ने कहा-
ज़िन्दगी तुझको मैंने जीने की ज़िद बनाया है,
लम्हा लम्हा ही सही, मुश्किलों से पाया है ।

रचना बंसल ने कहा-
साहिल बन तुम आओ प्रिये
किनारे मुझे मिल जाओ प्रिये
अब #ख्व़ाब में मेरेआकर तूम
बाहोँ में अपनी सुलाओ प्रिये

मुकेश लाडो शर्मा की कविता:-
बता जरा मेरे मन
चला-चला किस ओर
स्वपनिल नींद उड़ा
उड़ा किस ओर

अनिल मासूम ने कहा:-
बीच की दीवार को समझे हैं हम
अब तुन्हारे प्यार को समझे हैं हम

भूप राणा की कविता:-
नैन-नक्श दिखते नहीं, छुपे गुलाबी होठ।
‘भू्‍प’ मोरनी बाग की, फोड़े घर पर मोठ।।

कोमल वाणी ने कहा-
तेरे आँगन में तुलसी की वो क्यारी ही रहूँगी मैं,
बहे अविरल ह्रदय में वो खुमारी ही रहूँगी मैं।

राखी कुलश्रेष्ठ की रचना-
जन जन अधिनायक बनकर तुम देव दूत अधिकारी हो।
धर्म जाति को ऊपर रख मानवता सेवा पुजारी हो।

डॉ प्रतिभा जैन ने कहा-
उठ खड़ा हो इंसान,
ना तू कभी हारा था ,
ना तू कभी हारेगा ।

पूनम शर्मा ने कहा-
कोई सफर यूँ भी तो हो…,
मैं रखूँ कदम कहीं
पदचाप तुम्हारी ही हों,

जयवीर सिंह अत्री ने कहा:-
घर में रहकर बच्चों के संग लगा हुआ मेरा मन।
मुझको ऐसे लगता जैसे फिर लौट आया बचपन।।

मंजुलता मन की रचना:-
जग अरण्य में कोलाहल था बिखरा हुआ।
सहसा आज क्यों सन्नाटा ये पसरा हुआ।

भावना मिश्रा ने कहा-
ख़ता मत गिन्न इश्क़ में मेरे हमदम
किस ने कितना गुनाह किया
इश्क तो एक ज़ज्बात है हमदम
जो तुमने किया और मैने भी किया ।

मंजुला अस्थाना महंती की कविता-
जग अरण्य में कोलाहल था बिखरा हुआ।
सहसा आज क्यों सन्नाटा ये पसरा हुआ।

पवन ठाकुर ने कहा-
अपने गाँव को छोड़ा,
बाधा के रोड़ों से लड़ता
वन के पेड़ों से टकराता,

गोष्ठी का सुंदर और मनमोहक संचालन श्रीमती अंजू सिंह ने किया।अंत मे दीप शिखा दीप ने आभार व्यक्त किया।

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