न्यूज के लिए सबकुछ, न्यूज सबकुछ
ब्रेकिंग न्यूज़

जहरीली शराब का कहर

कोरोना महसंकट के बीच उत्तर प्रदेश राज्य के आजमगढ़ और अंबेडकर नगर जिले में जहरीली शराब के सेवन से डेढ़ दर्जन से अधिक लोगों की मौत इस बात का प्रमाण है कि राज्य में अवैध शराब निर्माण का धंधा जोरों पर है और निगाहबानी करने वाली संस्थाएं हाथ पर हाथ धरी बैठी हैं। यह ठीक है कि जिला प्रशासन तत्परता दिखाते हुए दोषियों के खिलाफ कार्रवाई और धरपकड़ शुरु कर दी है। लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। ऐसा इसलिए कि अवैध नशे का कारोबार रोकने के लिए इस तरह की असरहीन कार्रवाई पहले भी होती रही है लेकिन उसका सकारात्मक असर देखने को नहीं मिला। उल्टे शराब के अवैध कारोबार से जुड़े धंधेबाजों का हौसला बुलंद ही हुआ है। राज्य सरकार को समझना होगा कि जब तक अवैध शराब निर्माण से जुड़े माफियाओं और उन्हें प्रश्रय देने वाले लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं होगी तब तक जहरीली शराब से लोगों की जिंदगी मौत की भेंट चढ़ती रहेगी। अकसर देखा जाता है कि राज्य सरकार मृतकों के परिजनों को मुआवजा थमाकर अपने कर्तव्यों का इतिश्री समझ लेती है। किंतु यह समस्या का हल नहीं है। यह सिर्फ अपनी नाकामी छिपाने का तरीका भर है। भला यह कैसे संभव है कि जिस क्षेत्र में अवैध शराब निर्माण का धंधा चल रहा हो और स्थानीय प्रशासन एवं आबकारी विभाग को उसकी भनक तक न लगे। अकसर जिन गांवों में जहरीली शराब से लोगों की मौत होती है वहां लोग कहते सुने जाते हंै कि अवैध शराब निर्माण का काला कारोबार लंबे अरसे से चल रहा था। यह सच्चाई है कि देशी शराब को असरदार बनाने के लिए इसमें मिथेनाॅल मिलाया जाता है जो कि सेहत के लिए बेहद खतरनाक होता है। इसके पीछे का उद्देश्य भारी मुनाफा कमाना होता है। लेकिन इसके बावजूद भी शराब माफियाओं के खिलाफ उचित कार्रवाई नहीं की जाती है। यह तभी संभव है जब शराब माफियाओं को स्थानीय प्रशासन से संरक्षण मिलता होगा और वे इसके बदले में पैसा देते होंगे। जब भी जहरीली शराब से लोगों की मौत होती है उनके परिवारजनों द्वारा कहा जाता है कि स्थानीय पुलिस प्रशासन और आबकारी विभाग के लोगों का मिलावटी शराब माफियाओं से मिलीभगत होती है। अगर इसमें रंचमात्र भी सच्चाई है तो यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। अगर समय रहते स्थानीय प्रशासन व आबकारी विभाग द्वारा जहरीली शराब के कारोबारियों के खिलाफ शिकंजा कस दिया जाय तो लोगों को मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सकता है। बहरहाल यह जांच के बाद ही पता चलेगा इन मौतों के गुनाहगार और उनके संरक्षणदाता कौन हैं। लेकिन इतना अवश्य है कि इन मौतों के लिए जितना जिम्मेदार मिलावटी शराब माफिया हैं उतना ही स्थानीय प्रशासन और आबकारी विभाग भी। यह कहना मुश्किल है कि इस दर्दनाक घटना के बाद इसकी पुनरावृत्ति नहीं होगी। ऐसा इसलिए कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पहले भी शराब माफियाओं के खिलाफ कड़े कदम उठाने के दावे किए जाते रहे हैं। लेकिन सच्चाई है कि यह काला कारोबार थमा नहीं है और न ही जहर उगलती शराब भठ्ठियों का मुंह बंद किया जा सका है। याद होगा गत वर्ष पहले आजमगढ़ जिले के रौनापार में जहरीली शराब से 14 लोगों की मौत हुई। इसी जिले में वर्ष 2009 में 23 लोगों की मौत हुई। जहरीली शराब से सहारनपुर व कुशीनगर तथा उत्तराखंड राज्य के हरिद्वार में पांच दर्जन से अधिक लोग जान गंवा चुके हैं। अभी गत वर्ष पहले कानपुर नगर व देहात क्षेत्र में जहरीली शराब के सेवन से दर्जन भर से अधिक लोगों की मौत हुई। गौर करें तो उत्तर प्रदेश ही नहीं देश के अन्य राज्यों में भी जहरीली शराब का कारोबार चरम पर है। अभी गत वर्ष पले देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में जहरीली शराब से 50 से अधिक लोगों की मौत हुई। पश्चिम बंगाल के दक्षिण चैबीस परगना जिले में जहरीली शराब पीने से पौने दो सौ से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। इसी तरह बिहार में सैकड़ों लोग जहरीली शराब की भेंट चढ़ चुके हैं। शराब बंदी के बावजूद भी गुजरात राज्य के अहमदाबाद में 7 जुलाई, 2010 को 157 लोग जहरीली शराब की भेंट चढ़ गए। 2008 में कनार्टक में 180 लोग जान से हाथ धो बैठे। देश के अन्य राज्यों में भी इस तरह की घटनाएं विचलित करती रही हैं। अब मौंजू सवाल यह है कि जहरीली शराब से होने वाली मौतों का सिलसिल कब थमेगा और अवैध शराब के सौदागरों पर निर्णायक कारवाई कब होगी? सवाल यह भी है कि केंद्र व राज्य सरकारें दोनों मिलकर इसे रोकने की दिशा में ठोस पहल क्यों नहीं कर रही हैं? जबकि 2006 में सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि केंद्र व राज्य सरकारें संविधान के 47 वें अनुच्छेद पर अमल करें यानी शराब की खपत घटाएं। लेकिन गौर करें तो राज्य सरकारों का रवैया ठीक इसके उलट है। वह शराब पर पाबंदी लगाने के बजाए उसे बढ़ावा दे रही हैं। उत्तर प्रदेश की मौजूदा सरकार गायों के कल्याण के लिए शराब पर सेस लगा रखी है। सवाल लाजिमी है कि इस तरह की नीति से नशामुक्त समाज का निर्माण कैसे होगा? क्या इस राजनीतिक प्रवृत्ति से अवैध शराब के कारोबारियों का हौसला बुलंद नहीं होगा? बेहतर होगा कि केंद्र व राज्य सरकारें अवैध शराब के निर्माण और उसकी बिक्री की रोकथाम के लिए कड़े कानून बनाएं। अन्यथा जहरीली शराब से दम तोड़ने वालों का सिलसिला थमने वाला नहीं है। यह तथ्य है कि देश के सभी राज्यों में विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में हर रोज शराब की अवैध भट्ठियां हजारों लीटर जहर उगलती हैं। स्थानीय शासन-प्रशासन और आबकारी विभाग इससे अच्छी तरह अवगत होने के बाद भी उन्हें रोकने की पहल नहीं करता है। ऐसा इसलिए कि उन पर राजनीतिक दबाव तो होता ही है और साथ ही वे धनउगाही के धंधे में भी लिप्त होते हैं। यह किसी से छिपा नहीं है कि अवैध शराब से जुड़े अधिकांश माफिया राजनीति से जुड़े हैं या तो उन्हें राजनीतिक संरक्षण हासिल है। चूंकि अवैध शराब की कीमत कम और नशा ज्यादा होता है इसलिए इसे पीने वालों की तादाद लगातार बढ़ रही है। इसका सेवन करने वालों में अधिकांश गरीब, मजदूर और कम पढ़े-लिखे लोग होते हैं जो नशा के नाम पर भूल जाते हैं कि वे शराब पी रहे हैं या जहर गटक रहे हैं। ध्यान देना होगा कि शराब की जहरीली होने का मुख्य कारण घातक मिथाइल एल्कोहल होता है जो ऊंचे तापमान पर उबालने पर हानिरहित इथाइल एल्कोहल में बदलता है। लेकिन शराब निर्माण की प्रक्रिया की अधूरी जानकारी और लापरवाही के कारण इसमें घातक रसायनों का प्रयोग जहर का काम कर जाता है। लिहाजा पीते ही लोग उल्टियां करने लगते हैं और आंखों के सामने अंधेरा छा जाता है। यकृत क्षतिग्रस्त हो जाता है और लोग मौत के मुंह में चले जाते हैं। लेकिन इससे भी अवैध शराब माफियाओं की संवेदना प्रभावित नहीं होती है और न ही शासन-प्रशासन विचलित होता है। हद तो तब होती है जब स्थानीय पुलिस-प्रशासन अवैध शराब माफियाओं के खिलाफ कठोर कार्रवाई के बजाए उनके बचाव में उतर आता है। इसका परिणाम यह होता है कि सैकड़ों की जान लेने वाला गुनाहगार दंड से बच निकलता है। उचित होगा कि देश की सभी राज्य सरकारें ऐसे अवैध शराब माफियाओं और इन्हें संरक्षण देने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करे। इसके लिए राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में अभियान चलाया जाना चाहिए ताकि चोरी से चलाए जा रहे अवैध भट्ठियों को नेस्तनाबूद किया जा सके। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि राज्य सरकारें मौत के शिकार हुए लोगों के परिजनों को मुआवजे की रकम थमाकर अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री समझ लेती हैं। यह उचित नहीं है। यह राजसत्ता की संवेदनहीनता और गांधी के नशामुक्त भारत के सपनों का उपहास है।

 

अरविंद जयतिलक

Print Friendly, PDF & Email
Skip to toolbar