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प्रजा फाउंडेशन की ‘पुलिस तथा कानून व्यवस्था की स्थिति’ रिपोर्ट

विजय न्यूज़ ब्यूरो
नई दिल्ली। प्रजा फाउंडेशन ने आज दिल्ली में ‘पुलिस तथा कानून व्यवस्था की स्थिति’ पर अपनी रिपोर्ट जारी की, जिसमें इस तथ्य को विशेष रूप से उजागर किया गया कि किस प्रकार पिछले कुछ वर्षों में अपराध की घटनाओं ने एक सुरक्षित शहर के रूप में दिल्ली की छवि को नुक़सान पहुंचाया है।
हाल के वर्षों में, भले ही बलात्कार, छेड़छाड़ और अपहरण के मामलों में गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त आंकड़े बच्चों के खिलाफ यौन अपराध में बढ़ोतरी की प्रवृत्ति को दर्शाते हैं।
इस अवसर पर प्रजा फाउंडेशन के निदेशक, श्री मिलिंद म्हस्के ने कहा, “यौन उत्पीड़न से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत बच्चों के खिलाफ़ दर्ज किए गए आपराधिक मामलों में हमने पाया कि दिल्ली में बलात्कार के कुल 63% मामलों (1,965 में से 1,237 मामले) में दरिंदों ने मासूम बच्चों को अपना शिकार बनाया। इसके अलावा, वर्ष 2018-19 में अपहरण एवं बहला-फुसलाकर भगाने के कुल मामलों में से 94% (5,555 मामले) बच्चों के अपहरण के थे। साथ ही अपहरण के मामलों की अधिकतम संख्या लड़कियों के अपहरण से संबंधित थे – अर्थात वर्ष 2018-19 में 70% मामलों में लड़कियों का अपहरण किया गया था।
इसके अलावा, RTI से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2014-15 से वर्ष 2018-19 की अवधि में, दिल्ली में रिपोर्ट किए गए बलात्कार के मामलों में 6% की गिरावट आई, जबकि रिपोर्ट किए गए छेड़छाड़ के मामलों में 30% की कमी दर्ज की गई। रिपोर्ट किए गए प्रमुख आपराधिक मामलों की बात की जाए, तो चोरी के मामले की संख्या वर्ष 2014-15 में 52,211 थी, जो वर्ष 2018-19 में 108% बढ़कर 1,08,406 तक पहुंच गई।

  • दिल्ली में बलात्कार के 1,965 मामलों में से 1,237 मामले (63%) ‘यौन उत्पीड़न से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम’ के तहत दर्ज किए गए थे, जिनमें पीड़ित बच्चे थे।
  • वर्ष 2018-19 के दौरान, दिल्ली के बाहरी ज़िले में बलात्कार (218), छेड़खानी (378) तथा अपहरण एवं बहला-फुसलाकर भगाने (863) के सबसे ज्यादा मामले दर्ज किए गए, जबकि उत्तर-पश्चिम दिल्ली में चोरी के मामलों की संख्या (12,875) सबसे अधिक थी।
  • वर्ष 2018-19 में अपहरण एवं बहला-फुसलाकर भगाने (Abduction) के कुल मामलों में से 94% (5,555 मामले) बच्चों के अपहरण के थे। वर्ष 2018-19 में 70% मामलों में लड़कियों का अपहरण किया गया था।
  •  वर्ष 2017 में दिल्ली में आईपीसी के तहत कुल 4,02,512 मामलों की जांच की जानी थी, जिनमें से 35% मामलों में साल के अंत तक जांच पूरी नहीं हो पाई थी। वर्ष 2017 में दिल्ली में आईपीसी के तहत कुल 2,42,125 मामलों की अदालतों में कानूनी जाँच की जानी थी, जिनमें से 89% मामलों में साल के अंत तक ट्रायल पूरा नहीं हो पाया था।
  • वर्ष 2018-19 के दौरान दिल्ली में कुल 11% पुलिसकर्मियों की कमी थी। वर्ष 2018-19 में दिल्ली में पुलिस सब-इंस्पेक्टर जैसे जांच अधिकारियों (IOs) की 36% कमी  थी।
  •  दिल्ली पुलिस में अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त (Addl. D.C.P.) के पद पर नियुक्त कर्मियों की कमी सबसे ज्यादा थी- अर्थात वर्ष 2018-19 में यह कमी 41% थी।
  •  दिल्ली में महिलाओं से संबंधित अपराध एक बड़ी समस्या बनी हुई है, इसके बावजूद ‘वर्ष 2014 के बजट सत्र से लेकर वर्ष 2018 के शीतकालीन सत्र’ तक इससे जुड़े मुद्दों पर सांसदों ने केवल 5 प्रश्न पूछे।

प्रजा फाउंडेशन के संस्थापक एवं प्रबंध न्यासी, श्री निताई मेहता ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा, “क्या इससे पता चलता है कि दिल्ली में अपराध की स्थिति में सुधार हुआ है? या फिर इससे यह पता चलता है कि दिल्ली के नागरिकों को पुलिस के पास आपराधिक घटनाओं की रिपोर्ट करने में परेशानी हो रही है?”
श्री म्हस्के ने आगे कहा, “दूसरी बात ज्यादा सच लगती है, खासकर तब, जब प्रजा की ओर से हंसा रिसर्च द्वारा दिल्ली में 27,121 परिवारों के सर्वेक्षण के नतीजों पर बारीकी से गौर किया जाए। सर्वेक्षण में शामिल कुल परिवारों में से, 10% उत्तरदाताओं ने शहर में अपराध होते हुए देखा तथा इनमें से 57% ने पुलिस को इसकी सूचना नहीं दी। ठीक इसी प्रकार, 35% उत्तरदाताओं ने अपराध का सामना किया और इनमें से 26% ने पुलिस को इसकी सूचना नहीं दी। वास्तव में अगर अपराध को देखने और पुलिस को इसकी सूचना देने वाले उत्तरदाताओं की बात की जाए, तो इनमें से केवल 4% ने पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई। अपराध का सामना करने तथा इसकी रिपोर्ट कराने वाले लोगों में से केवल 5% ने पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई।”
पुलिस को अपराध की सूचना देने वालों की बात की जाए- जिसमें 72% उत्तरदाता अपराध के गवाह थे और 73% उत्तरदाताओं ने अपराध का सामना किया था – तो वे पुलिस की प्रतिक्रिया से बिल्कुल संतुष्ट नहीं थे। इसके अलावा, उत्तरदाताओं के एक बड़े हिस्से – जिसमें 20% उत्तरदाता अपराध के गवाह थे और 26% उत्तरदाताओं ने अपराध का सामना किया, परंतु पुलिस को रिपोर्ट नहीं की- ने कहा कि उन्होंने ऐसा इसलिए नहीं किया क्योंकि उन्हें ‘पुलिस / कानूनी प्रक्रिया’ पर जरा भी यक़ीन नहीं था।
ट्रैफिक रेलवे बोर्ड के पूर्व सदस्य तथा आईसी सेंटर फॉर गवर्नेंस के महासचिव, श्री शांति नारायण ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा, “मौजूदा परिस्थितियां दिल्ली में कानून-व्यवस्था की बेहद ख़राब छवि को दर्शाती हैं। स्पष्ट है कि यह महज कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि यह मानसिकता से जुड़ा मुद्दा है जहां लोग अपनी समस्याओं के निवारण हेतु पुलिस से संपर्क करने तथा समुचित न्यायिक प्रक्रिया का पालन करने के बजाय मनमाने ढंग से प्रतिशोध को ज्यादा पसंद करते हैं। मौजूदा स्थिति में तुरंत सुधार किए जाने की जरूरत है, ताकि भविष्य में स्थिति को बेहतर बनाया जा सके तथा लोगों को न्यायपालिका पर फिर से भरोसा हो सके।”
श्री म्हस्के ने आगे बताया, “सबसे अहम पहलू, अर्थात लोगों की मानसिकता – इसमें अपराधों की जांच करने एवं न्याय दिलाने के लिए ज़िम्मेदार लोगों के साथ-साथ अपराध का सामना करने वाले/ अपराध करने वाले लोग भी शामिल हैं- के लिए अत्यधिक संवेदनशीलता की जरूरत होती है। जब नागरिक अपराध होते हुए देखते हैं/ सामना करते हैं, तो इसके बाद उन्हें पुलिसकर्मियों को इसकी सूचना देने में यकीन हासिल करने और सहज महसूस करने की आवश्यकता है। इसके लिए, विश्वास निर्माण एवं जागरूकता गतिविधियों के जरिए पुलिस-नागरिक संबंध को मजबूत किया जाना चाहिए। दरअसल नागरिकों के प्रति अनुकूल छवि और दृष्टिकोण विकसित करने के लिए पुलिसकर्मियों की संवेदनशीलता बेहद अहम है।”
दूसरी तरफ नागरिकों को अपने परिवेश को लेकर जागरूक और सतर्क रहना चाहिए, ताकि वे किसी भी आपराधिक और / या दुष्कर्म की घटना पर प्रभावी कार्रवाई के लिए पुलिसकर्मियों को समय पर रिपोर्ट कर सकें। स्थानीय पुलिस तथा सामाजिक-आर्थिक क्षेत्रों के अलग-अलग प्रतिनिधियों और विभिन्न सामुदायिक संगठनों के बीच नियमित तौर पर आयोजित की जाने वाली पुलिस-सामुदायिक बैठकों के माध्यम से ऐसा किया जा सकता है।
श्री मेहता ने निष्कर्ष निकालते हुए कहा, “इस प्रकार की गतिविधियों से मानसिकता में बदलाव लाने, हर आयु वर्ग के लोगों के बीच जागरूकता फैलाने (ख़ासतौर पर यौन अपराध से जुड़े मामलों में), तथा सुरक्षित परिवेश, सुरक्षित शहर और विशेष रूप से युवा नागरिकों के भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए आपराधिक न्याय प्रणाली में सहयोगपूर्ण दृष्टिकोण के निर्माण में मदद मिल सकती है।

प्रजा फाउंडेशन के बारे में:
शासन में उत्तरदायित्व एवं पारदर्शिता को पुनः स्थापित करने के लक्ष्य के साथ वर्ष 1997 में प्रजा का गठन किया गया था। स्थानीय सरकार में जनता की घटती अभिरुचि की समस्या को ध्यान में रखते हुए प्रजा नागरिकों के बीच जागरूकता फैलाने के लिए प्रयासरत है, और इसलिए उन्हें ज्ञान के माध्यम से सशक्त बनाना चाहता है।
प्रजा का मानना है कि, लोगों के जीवन को सरल बनाने और भागीदारी को प्रोत्साहित करने की दिशा में जानकारी की उपलब्धता का अहम योगदान है। यह एक समग्र दृष्टिकोण अपनाते हुए सुशासन कायम करने की दिशा में निर्वाचित प्रतिनिधियों तक जनता के विचारों के पहुँचने को सुनिश्चित करना चाहता है। इसके साथ-साथ ऐसी युक्तियाँ और तंत्र भी अवश्य मौजूद होने चाहिए, जिसकी मदद से जनता अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा किये गए कार्यों पर कड़ी नजर रखने में सक्षम हो सके। लोगों के जीवन को सरल बनाना, तथ्यों के माध्यम से जनता एवं सरकार को सशक्त करना तथा भारत की जनता के जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए परिवर्तन की युक्तियों का निर्माण करना प्रजा के लक्ष्य रहे हैं। प्रजा लोगों की भागीदारी के माध्यम से एक जवाबदेह एवं कार्यक्षम समाज के निर्माण हेतु प्रतिबद्ध है।

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