National Hindi Daily Newspaper
ब्रेकिंग न्यूज़

प्रेम ईश्वर का अमूल्य उपहार

दौर बहुत बदल चुका है और दौर के बदलने से हमारी धारणाएं भी बदल चुकी हैं और परिणाम ये हुआ कि अब हम जीने को तो जी रहे हैं लेकिन जीने का मजा नहीं ले रहे जबकि जीवन आनंद का नाम है।जीवन प्रेम का नाम है।जीवन खुलकर जीने और उसका उत्सव मनाने का नाम है पर हमने जीवन को बोझ ही मान लिया।हमने जीवन को वरदान की बजाय अभिशाप ही मान लिया और जीवन दूभर हो गया।ऐसा सिर्फ और सिर्फ इसलिए हुआ कि दौर बदलने के साथ जब हमने धारणाएं बदली तो हमने शाश्वत सत्य को ही बदल डाला जबकि सत्य यह है कि बेशक दौर बदला हो,धारणाएं बदली हो लेकिन शाश्वत सत्य कभी बदला नहीं करते।दुर्भाग्य कि इस कड़ी में हमने प्यार के मायने बदल लिए जबकि प्रेम एक शाश्वत सत्य है,प्रेम सत्-चित-आनंद है बल्कि परम आनंद है,जीवन का मूल है,आधार है और हम इसी आधार को किसी और मायनों में ले गए।हमने प्यार को वासना समझकर चंद लम्हों का ही आनंद मान लिया और जिंदगी का ही कबाड़ा कर बैठे।हमने प्रेम की भाव और परिभाषा को इतना संकीर्ण कर दिया कि हम खुद भी संकीर्ण होते चले गए और दावा हम प्रेममय होने का करते रहे जबकि प्रेम केवल देता है,लेने का तो उसमें कहीं नाम ही नहीं होता और हमने प्रेम को लेने देने का माध्यम स्वीकार कर लिया।प्रेम को हमने विपरीत लिंग से ही मात्र जोड़ दिया जबकि समस्त संसार और ईश्वर की बनाई हुई तमाम कृतियों से प्रेम करना और उसमें प्रेममय हो जाना ही तो प्रेम है।मेरे जीवन का प्रत्येक क्षण प्रेम है।ईश्वर का दिया उपहार है।इसे मुझे हर पल हर हाल में सिर्फ और सिर्फ प्रेममय होकर जीना है,तभी तो मैं जीवन का रसास्वादन कर पाउँगा।रही-सही कसर प्रेम के विरिधियों ने निकाल दी कि हाथ धोकर प्रेम के पीछे ही पड़ गए,लठ्ठ लेकर,मानों आज के युवक-युवतियां प्रेम न करके कोई आंतकवादी गतिविधि कर रहे हों।जबकि हमारे सब धर्म-ग्रंथ चिल्ला चिल्लाकर प्रेममय होने की दुहाई दे रहे हैं लेकिन हम नारे तो उनके नाम के लगाएंगे लेकिन प्रेम नहीं करेंगे और ना ही होने देंगे।दल तो उन्हीं के नाम पर बनाएंगे,जिन्होंने प्रेम को प्रतिष्ठापित किया मगर हम उनके नाम पर प्रेम नहीं नफरत फैलाएंगे।खास बात यह भी कि प्रेम किसी एक दिन या हफ्ते भर का मोहताज नहीं है।प्रेम तो प्रेम है जो हर क्षण हर पल है,पल-प्रतिपल है।प्रेम हमारे रग रग में बहना चाहिए और वासना से दूर होना चाहिए।हाँ,यदि प्रेम तमाम मर्यादाओं से ऊपर उठ जाए तो वासना का कोई महत्व ही नहीं रह जाता क्योंकि मुहबत का,प्यार का,प्रेम का सिर्फ यही है कि—
इश्क का तो बस यही उसूल है।
तू कबूल तो,तेरा किया सब कबूल है।।
    कृष्ण कुमार निर्माण

 

Print Friendly, PDF & Email
Translate »