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राजनीति का अपराधीकरण : सैयां भये कोतवाल तो डर काहे का

राजनीति के अपराधीकरण पर गाहे बगाहे मीडिया में एक बार सुर्खिया बनती है और फिर यह प्रकरण ठंडे बस्ते में समा जाता है। ताजा मामला देश के सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक बार फिर सांपों के इस पिटारे पर हाथ रखने से शुरू हुआ है। राजनीति के अपराधीकरण पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है। शुक्रवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश में राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए कुछ तो करना ही होगा। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका पर विचार करने की सहमति जताई है जिसमें आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को पार्टी प्रत्याशी न बनाने का आदेश जारी करने की अपील की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने राजनीति के अपराधीकरण को समाप्त करने को लेकर फ्रेमवर्क तैयार करने का चुनाव आयोग को शुक्रवार को निर्देश दिया है।
पिछले दो दशकों के इतिहास पर नजर दौड़ाएं तो अपराधी सियासत के इस मामले में हम खाली हाथ ही मिलेंगे। इस बारे में अनेक बार सुप्रीम कोर्ट अपनी चिंता जाहिर कर चुका है। चुनाव आयोग का रुख भी स्पष्ट है। राजनीतिक दल हाथी के दांत की कहावत से आगे बढ़ते नहीं मिलेंगे। मगर देश की जनता चाहती है दागी सियासत का नापाक गठजोड़ तोडा जाये। हालाँकि यह अलग बात है दागी को चुनाव तो जनता ही जिताती है। यहाँ सवाल यह पैदा होता है जब सब चाहते है की चुनाव से दागियों को दूर रखा जाये तो अब तक कोई भी स्पष्ट निर्णय क्यों नहीं ले पाता है। यह विचारणीय है। मोदी सरकार अपने साहसिक निर्णयों के लिए विख्यात है मगर राजनीति के अपराधीकरण पर वह भी चुप्पी साधे है। सही बात तो यह है दागियों ने सभी पार्टियों में अपनी पेठ मजबूत बना रखी है और बड़ी संख्या में माननीय ऐसे मामलों में फंसे हुए है। अब सैयां भये कोतवाल तो डर काहे का।
देश की सियासत में नेताओं और अपराध का चोली-दामन का साथ रहा है। आजादी के बाद से ही देश में जाति, धन और बाहुबल का दबदबा देखा गया। जाति और दागी सियासत धीरे धीरे बढ़ती गई और आजादी के 73 सालों के बाद भी हम इसका तौड़ नहीं ढूंढ पाए फलस्वरूप सियासत में इनका दबदबा आज भी कायम है। देश में ऐसी कोई भी राजनीतिक पार्टी नहीं, जो पूरी तरह से दागी मुक्त हो। यानी उनके किसी भी एक नेता पर अपराध के मामले दर्ज नहीं हों। यही वजह है कि राजनीति में अपराधीकरण के मामले पर अपने फैसले में भले ही सुप्रीम कोर्ट ने दागी सांसदों, विधायकों को अयोग्य ठहराने से इनकार कर दिया, मगर कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि अब संसद के भीतर कानून बनाने की जरूरत है। कोर्ट ने सभी राजनीतिक दलों को चुनाव लड़ रहे उनके जिन उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं, उनकी जानकारी वेबसाइटों और इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट, दोनों मीडिया में सार्वजनिक करने के निर्देश दिए। कोर्ट ने एक बार फिर आम नागरिकों की भावना को अपने शब्दों में व्यक्त किया है।
वर्तमान में 542 सांसदों में से 233 यानि 43 फीसदी सांसदों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे लंबित हैं। हलफनामों के हिसाब से 159 यानि 29 प्रतिशत सांसदों के खिलाफ हत्या, बलात्कार और अपहरण जैसे गंभीर मामले लंबित है। आपराधिक मामलों में फंसे सर्वाधिक सांसद केरल और बिहार से चुन कर आए। केरल से निर्वाचित 90 फीसदी, बिहार से 82 फीसदी, पश्चिम बंगाल से 55 फीसदी, उत्तर प्रदेश से 56 और महाराष्ट्र से 58 प्रतिशत सांसदों पर केस लंबित है। वहीं सबसे कम नौ प्रतिशत सांसद छत्तीसगढ़ के और 15 प्रतिशत गुजरात के हैं।
पिछले 73 सालों में जिस तरह हमारी राजनीति का अपराधीकरण हुआ है और जिस तरह देश में आपराधिक तत्वों की ताकत बढ़ी है, वह जनतंत्र में हमारी आस्था को कमजोर बनाने वाली बात है। राजनीतिक दलों द्वारा अपराधियों को शह देना, जनता द्वारा वोट देकर उन्हें स्वीकृति और सम्मान देना और फिर कानूनी प्रक्रिया की कछुआ चाल, यह सब मिलकर हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था और जनतंत्र के प्रति हमारी निष्ठा, दोनों, को सवालों के घेरे में खड़ा कर देते हैं।
चुनाव आते हैं तो राजनीति और अपराध जगत का संबंध भी सुर्खियों में आ जाता है. अपराधियों को नेताओं का समर्थन हो या नेताओं की अपराधियों को कानून के शिकंजे से बचाने की कोशिश, आखिर दलों पर अपराधियों का ये कैसा असर है । भारतीय लोकतंत्र में अपराधी इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं कि कोई भी राजनीतिक दल उन्हें नजरअंदाज नहीं कर पा रहा। पार्टियाँ उन्हें नहीं चुनती बल्कि वे चुनते हैं कि उन्हें किस पार्टी से लड़ना है। उनके इसी बल को देखकर उन्हें बाहुबली का नाम मिला है. कभी राजनीति के धुरंधर अपराधियों का अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करते थे अब दूसरे को लाभ पहुँचाने के बदले उन्होंने खुद ही कमान संभाल ली है।
राजनीतिक दलों द्वारा दागियों को शह देना, जनता द्वारा वोट देकर उन्हें स्वीकार करना हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को शर्मसार करती हैं। सच तो यह है कि बुराई लोकतांत्रिक व्यवस्था में नहीं बल्कि हमारे चरित्र में है। क्योंकि अपराधी नेताओं को जीता कर हम ही भेजते है। स्वस्थ लोकतंत्र का तकाजा है हम बदलेंगे तभी व्यवस्था में सुधार होगा। यदि हमें अपनी सियासत दागी मुक्त करनी है तो यह शुरुआत अपने घर से ही करनी होगी। हमें यह संकल्प लेना होगा की हम किसी भी हालत में अपराधियों को अपना मत नहीं देंगे तभी लोकतंत्र की पवित्रता कायम रहेगी।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
क्.32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

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