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रहिमन पानी राखिए…!

तोताराम जी की पोती उस शाम जोर जोर की आवाज़ में पढ़ रही थी – ” रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न उबरे मोती,मानस, चून।” अर्थात् रहीम जी कहते हैं हे मानव ! हमेशा पानी रखिए, पानी के बिना यह संसार सूना है। यदि इस धरती पर पानी नहीं रहेगा तो न तो समन्दर में मोती ही पैदा होंगे(उबरेंगे) और न ही मनुष्य और चून(आटा) का कोई महत्व होगा। तोताराम जी बड़े ही तल्लीन भाव से अपनी पोती को रहीम जी के इस दोहे में निहित भाव को बता रहे थे। हम घूमते घुमाते उस दिन तोताराम जी के घर चले गए थे। कभी तोताराम हमारे यहां तो कभी हम उनके यहाँ आते जाते रहते हैं। आपसी प्यार मोहब्बत जो हैं। तोताराम जी व उनकी पोती के पास रखी कुर्सी पर खुद को जमाते हुए हमने भी पानी में इंटरेस्ट लिया। हमने कहा बेटा, पानी पानी ही है। उसकी बड़ी कीमत और महत्व है। जिस व्यक्ति ने इस संसार में पानी की कीमत नहीं जानी,समझिए उसने अपने प्राणों की कीमत कभी नहीं जानी। ब्रह्मांड में पाए जाने वाले पांच तत्वों मिट्टी, हवा, अग्नि, आकाश और जल मेंं वैसे तो सभी तत्वों का अपना महत्व और महत्ता हैं लेकिन जल तत्व समस्त प्राणी जगत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण तत्व है। हमारी धरती के तीन चौथाई भाग पर पानी की उपस्थिति हैं और धरती केवल एक चौथाई भाग ही है। हमने बताया कि हमारे शरीर का सत्तर से पिचहत्तर प्रतिशत भाग सिर्फ और सिर्फ पानी से ही बना है। तोताराम की पोती के साथ स्वयं तोताराम भी हमारी बातें सातें बड़े ही ध्यानपूर्वक सुन रहे थे। हमने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा पानी की उपस्थिति लगभग लगभग हर स्थान व जगह में है। आकाश पाताल में पानी है। हवा में वाष्प कणों में, जमीन में तरल रूप में और पहाड़ों पर जो बर्फ जमी है, ग्लेशियर वगैरह में, पानी हमारी धरती पर ठोस रूप में उपलब्ध है। ग्लेशियरों के पानी एवं वर्षा जल को तो सबसे शुद्ध पानी माना जाता है। वैसे, कुओं के जल को भी शुद्ध माना जाता है। हमने तोताराम जी की पोती को कहा ” बिटिया पानी के बिना प्राणी जगत का अस्तित्व संभव नहीं है, इसलिए पानी अनमोल है, पानी अमृत तुल्य है।” अब हम बिटिया को पानी की प्रतिशतता के बारे में जानकारी देने लगे थे, क्योंकि अचानक हमें याद आया था कि बाइस मार्च को हम विश्व जल दिवस मनाते हैं। हमने बिटिया को बताया कि महासागर जो कि हमारी पृथ्वी का ( हमारे नीले ग्रह का) लगभग तीन-चौथाई भाग घेरे हुए हैं, लेकिन पृथ्वी पर पानी की उपलब्धता मीठे जल के रूप में केवल 2.7 प्रतिशत ही है, और इसमें से भी लगभग 75.2 प्रतिशत धुव्रीय प्रदेशों में बर्फ के रूप में विद्यमान है। हमने बताया कि भूजल के रूप में तो केवल 22.6 प्रतिशत ही उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त जल की उपलब्धता कुओं, बावड़ियों, नहरों, तालाबों, झीलों, नदियों, वायुमंडल के साथ ही नमी के रूप में, मृदा तथा वनस्पति में भी पानी की उपलब्धता है। हम तोताराम जी व उनकी पोती के साथ पानी के बारे में बातचीत कर ही रहे थे कि इतने में तोताराम जी की धर्मपत्नी जी हम सभी के लिए एक ट्रे में पानी लेकर आ गई, हम सबने पानी पिया और पानी पीने के बाद हम बिटिया को बताने लगे कि देखा बिटिया पानी हमारे कितना काम आता है। आदमी के पल पल की जरूरत है पानी। हम भोजन के बिना काम चला सकते हैं लेकिन पानी के बिना नहीं। पानी से हमारी प्यास बुझती है, शरीर को ऊर्जा प्राप्त होती हैं, हमारा शरीर पानी के कारण ही स्वस्थ बना रहता है और हम काम कर सकते हैं। खाना बनाने से लेकर कपड़े धुलने धुलाने, बरतन साफ करने,नहाने के साथ ही विभिन्न उधोग धंधों को चलाने, पशुओं को नहलाने, उन्हें पानी पिलाने, खेतों में सिंचाई करने, पर्यावरण में पेड़ पौधों व वनस्पतियों को जिंदा रखने में पानी की कितनी अहम व महत्वपूर्ण भूमिका है, यह तो तुम्हें पता ही होगा, लेकिन चूंकि पानी इस पृथ्वी पर बहुतायता में उपलब्ध है और इंसान को आसानी से उपलब्ध हो जाता है, इसलिए मानव इसकी कीमत को नहीं समझ पा रहा है, वह पानी को असीमित समझ बैठा है। आदमी की एक अत्यंत साधारण व सरल सी सोच है कि पानी पृथ्वी पर पाया जाने वाला असीमित व अथाह संसाधन है, यह कभी न खत्म होने वाला संसाधन है।आज आदमी पानी का असीमित दोहन कर रहा है, पानी की कोई कीमत नहीं समझते हुए उसे व्यर्थ बहा रहा है।
एक समय था जब पानी जमीन के भीतर मात्र 40 या 45 फुट की गहराई में मिल जाता था। अब एक जमाना यह भी है कि हजारों फुट की गहराई से पहले इसके दर्शन नसीब नहीं हो पाते हैं। हमने कहा बिटिया देखो हमें पानी की कीमत समझनी चाहिए, हमें इसकी बचत के लिए सार्थक व ठोस प्रयास करने चाहिए। हमने कहा देखो बिटिया रानी रेगिस्तानी इलाकों में आज भी गांव घरों की औरतें अपने सिर पर पानी के मटके उठाएं दूर दूर से पानी लेने जाती हैं। जल को भारतीय संस्कृति में देवता का दर्जा यूं ही नहीं दिया गया है, उसका कारण है, हम अपनी नदियों की पूजा करते हैं। राजस्थान सहित देश के अनेक राज्यों में पुत्र जन्म पर कुंआ पूजन की परंपरा है। गंगा, यमुना व सरस्वती जैसी नदियों की हम आज भी पूजा करते हैं। गंगा के जल के बारे में तो यहां तक कहा जाता है कि इसका जल अत्यंत ही पवित्र है और इसमें प्रदूषण की मात्रा बहुत ही कम है, इसलिए इसके जल में कभी कीड़े नहीं पड़ते हैं और हम अनेक कर्मकांंडों, पूजा अर्चना में इसके जल का उपयोग करते हैं। जल का जो व्यक्ति सम्मान करता है, जल भी उसका सम्मान करता है, अर्थात् जल का हमें सदैव विवेकपूर्ण व सही उपयोग करना चाहिए, क्योंकि इस पर समस्त चराचर जगत का भविष्य टिका हुआ है। यदि हम स्वयं जल संरक्षण करेंगे तो हमारे जीवन पर कभी कोई खतरा नहीं मंडरायेगा। जो जल की रक्षा करता है, जल भी उसकी रक्षा करता है। जहां जल है, वहाँ हरियाली ही हरियाली है। जहां जल की उपलब्धता नहीं है, वहाँ संस्कृतियों का विकास नहीं हुआ है, तुम अपनी किताबें उठाकर देख सकती हो, इसके लिए तुम इतिहास की किताबें और पर्यावरण की किताबें पलट सकती हो।
जहाँ जल की उपलब्धता नहीं है वहाँ रेगिस्तान, सूखा, भुखमरी, विलाप-विषाद और मृत्यु का तांडव है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने 22 मार्च को विश्व जल दिवस के रूप में घोषित किया है। इसलिए मैं तो कहता हूं कि ” जल बचाओ – कल बचाओ”, “जल नहीं तो कल नहीं”, “जल ही जीवन है” , “जल बिन सब निर्जन है”, “पानी हम बचायेंगे – घर-घर खुशहाली लायेंगे”, “जल संरक्षण है एक संकल्प – इसका नहीं है कोई विकल्प”, “जनहित में यह सूचना जारी – जल संरक्षण की करो तैयारी”, “जन-जन ने ठाना है – जल को अब बचाना है।” तोताराम हमारे जल ज्ञान को सुनकर अभीभूत हो गए। तभी तोताराम जी की धर्मपत्नी चाय लेकर आईं और हम चाय की चुस्कियों में डूब गए। अंत में, आप सभी से यही कहूंगा कि रहीम जी बातों को ध्यान में रखते हुए “जल बचाएं, इसे व्यर्थ न बहाएं।”

धार्विक नमन, “शौर्य”, पटियाला, पंजाब
स्वतंत्र लेखक व साहित्यकार
मोबाइल 7002291248

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