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असली नकली अंग्रेजी दवाइयों का गोरखधंधा

हमारे देश में अंग्रेजी दवाइयों ने घर घर में अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया है। जिसे देखो अंग्रेजी दवाइयों के पीछे भागता मिलेगा। सामान्य बीमारियों से लेकर असाध्य बीमारियों की दवा आज घरों में मिल जाएगी। इनमें चिकित्सकों द्वारा लिखी दवाइयों के अलावा वे दवाइयां भी शामिल है जो मेडिकल स्टोर्स से बीमारी बताकर खरीदी गई है अथवा गूगल से खोजकर निकाली गई है। ये दवाइयां असली है या घटिया अथवा नकली ये भी आम लोगों को मालूम नहीं है। घटिया दवाइयों का बाजार आजकल खूब फलफूल रहा है। आये दिन घटिया और नकली दवाइयां बरामद करने की खबरें मीडिया में सुर्खियों में पढ़ने को मिल रही है। इन दवाइयों के सेवन से साधारण खांसी बुखार और जुखाम को ठीक होने में एक पखवाड़ा या महीना लग जाता है। इसके बावजूद ऐसी दवाइयां खरीदने में हमें कोई हिचकिचाहट नहीं हो रही है। लोग सामान्य बीमारियों में अस्पतालों में लम्बी लाइनों में धक्का खाने की अपेक्षा दूकानों से दवा खरीद लेते है। अनेक बार बड़े मुनाफे के चक्कर में दुकानदार घटिया दवाएं लोगों को थमा देते है जो आगे जाकर स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित होती है। पढ़े लिखे लोगों को भी बिना डॉक्टर को दिखाएं ऐसी दवाएं खरीदते देखा जा सकता है। सरकारी दुकानों पर मिलीभगत से ब्रांडेड दवा के नाम से नकली दवा बेचने का खेल भी चल रहा है। अंग्रेजी दवाओं के इस जंजाल से निकलना आम लोगों के लिए भारी मुश्किल हो रहा है। अंग्रेजी दवाओं के इस चक्रव्यूह में फंसना तो आसान है मगर निकलना दूभर।
एक रिपोर्ट के अनुसार देशभर में झोलाछापों का तंत्र सक्रिय है। इन लोगों ने सस्ता इलाज कराने के नाम पर क्लिनिक खोल रखे हैं। यहां पर रोजाना कई प्रकार की दवाइयां मरीजों को इलाज के नाम पर दी जाती है। ये दवाइयां बेहद घटिया होती है। लोग जाने अनजाने इनके चक्र में फंस जाते है। हालाँकि सरकार ने अनेक स्थानों पर अभियान चलकर ऐसे झोलाछापों की धरपकड़ भी की है फिर भी इनका तंत्र पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है। इसी भांति नशीली दवाइयों का व्यापार भी बेरोकटोक जारी है। नशीली दवाओं के चपेट में आने वाले युवा नशे के लिए छोटे-मोटे अपराध करने से भी नहीं डरते हैं और चोरी वह मारपीट जैसी घटनाओं को अंजाम देते हैं। ऐसी दवाइयां भी धड़ल्ले से उपलब्ध है। जिंदगी के साथ खिलवाड़ करने का यह खेल राजधानी दिल्ली, हिमाचल, हरियाणा, राजस्थान, यूपी, पंजाब, बिहार आदि राज्यों से शुरू होता है। इन स्थानों से लाईं गई दवाइयों में असली और नकली में अंतर कर पाना आसान नहीं होता। इसी के चलते इन दवाईयों को आसानी से ग्राहकों को बेच दिया जाता है। इनकी कीमत भी असली दवाओं से कम होती है। सरकारी दुकानों पर मिलीभगत से ब्रांडेड दवा के नाम से नकली दवा बेचने का खेल भी चल रहा है। एक्सपायरी दवाओं की री-पैकिंग कर बेचने वाले गिरोह भी सक्रीय है।
अंग्रेजी दवाइयों का गड़बड़झाला भारत में शुरू से ही रहा है। इसके वर्चस्व को तोड़ने की गंभीर कोशिश कभी नहीं हुई जिसके फलस्वरूप इनके दाम मनमाने तरीके से निर्धारित हुए। आम आदमी के समझ से बाहर होने के कारण अंग्रेजी दवाइयों ने खौफनाक ढंग से देश के बाजार पर अपना कब्जा कर लिया। इस जनद्रोह में विदेशी के साथ देशी कम्पनियाँ भी शामिल थी जिन्हे राजतन्त्र का परोक्ष समर्थन शामिल था। इस दौरान नकली और घाटियां दवाइयों का बाजार भी खूब फला फुला। एक रूपये में बनने वाली टेबलेट 100 रुपयों में बेचीं गई। जीवन रक्षक दवाइयों के दाम आसमान को छूने लगे। राजनीतिक पार्टियों और सामाजिक संगठनों ने इस लूट के खिलाफ कभी जोरदार आवाज बुलंद नहीं की। दवा कम्पनियाँ अपने राजनीतिक आकाओं के हित साधने लगी। यही नहीं घटिया और नकली दवाओं का बाजार भी खूब गर्म हुआ। मानव स्वास्थ्य के साथ सरेआम खिलवाड़ हुआ। बड़ी संख्यां में लोग मौत के मुहं में समां गए तब जाकर राज की निंद्रा टूटी। मगर आपाधापी की कारवाही के आगे कुछ नहीं हुआ। नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद इस गड़बड़झाले को समझने का प्रयास अवश्य हुआ। दवाइयां कुछ हद तक सस्ती हुई मगर अभी भी आसमान काले रंग से रंगा हुआ है। सबसे पहले दवाओं के तिलिस्म को समझने की जरुरत है।
एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में लगभग 200 बिलियन डालर का घटिया और नकली दवाओं एवं वैक्सीन का धंधा है। एशिया में बिकने वाली 30 प्रतिशत दवाएँ नकली या घटिया हैं। भारत में बिकने वाली हर पाँच गोलियों के पत्तों में में से एक नकली है। इन दवाइयों से हर वर्ष लगभग 5 प्रतिशत धनहानि देश को होती है और ये धंधा बेरोकटोक चल रहा है और असली दवाइयों के व्यापार से भी ज्यादा तरक्की कर रहा है। दवा एक केमिकल होता है। रसायन होता है। दवा कंपनियां अपने मुनाफा एवं विपरण में सहुलियत के लिए इन रसायनों को अलग से अपना ब्रांड नाम देती है। जैसे पारासेटामल एक साल्ट अथवा रसायन का नाम है लेकिन कंपनिया इसे अपने हिसाब से ब्रांड का नाम देती हैं और फिर उसकी मार्केंटिंग करती है। ब्रांड का नाम ए हो अथवा बी अगर उसमें पारासेटामल साल्ट है तो इसका मतलब यह है कि दवा पारासेटामल ही है।
एक शोध में यह भी कहा गया है महंगी अंग्रेजी दवाइयों के कारण देश के 3 फीसद लोग गरीबी रेखा से नहीं ऊबर पा रहे हैं। एक तथ्य यह भी है कि भारत के लोग सालाना 82 हजार करोड़ रुपये की सिर्फ अंग्रेजी दवाई उपभोग कर रहे हैं। शोध में यह भी कहा गया है कि आम भारतीयों को अपने स्वास्थ्य बजट का 72 फीसद केवल दवाइयों पर खर्च करना पड़ता है।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
डी .32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 8949519406

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