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मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना

आज सुबह- सुबह पंडित जी ने तीन बार छींक दिया। पहली छींक पर ओम् नमः शिवाय, दूसरी छींक पर कुछ कहते इससे पहले तीसरी छींक ने उन्हें हिलाकर रख दिया। खास बात यह थी कि तीसरी छींक पर ओम् नमः शिवाय की जगह कोरोना बोल बैठे। जहाँ तक उन्हें पता है शास्त्रों में कोरोना नाम से कोई मंत्र या श्लोक नहीं है। हाँ यह अलग बात है कि आजकल करीना से ज्यादा कोरोना गूगल हो रहा है। जब से पंडित जी कुंभ मेला होकर आए हैं तब से तबीयत बाजार की मंदी की तरह नासाज़ है। वह छींक वाली बात अपनी पत्नी से छिपाने की लाख कोशिश कर रहे थे। चूंकि पत्नी पति की हर बात का पता लगाने के लिए होती हैं, सो छींक की बात छिपी न रह पायी। पंडिताइन ने एक्शन से पहले ऐसे-ऐसे रिएक्शन दिए कि पंडित जी की शामत उनके सिर पर डिस्को कर रही थी।

पंडिताइन ने कहा – मैंने आपको लाख समझाया कि इस बार कुंभ मेला रहने दीजिए। अगली बार हो आना। लेकिन आप पर तो पुण्य कमाने का भूत सवार था। कहते थे गंगा स्नान करने से सारे पाप मिट जायेंगे। कोरोना तो क्या कोरोना का बाप भी आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मास्क और सेनिटाइजर को तो ऐसे दूर फेंकते जैसे छुआछूत की चीज हो। गए तो गए अपने साथ और दो-चार को ले गए। पता चला कि उन्हें भी कोरोना हुआ है।

पंडित जी ने पंडिताइन को गुस्से से देखते हुए कहा – अरे भाग्यवान! मैंने कब कहा कि मुझे कोरोना हुआ है। वह तो मैने तीन बार छींक दिया इसलिए शंका होने लगी। वरना ऐसी कोई बात नहीं है। मुझे तो मात्र संदेह है कि कहीं यह कोरोना का लक्षण तो नहीं। बस इतनी सी बात को लेकर पूरा घर सिर पर उठा रखी हो। ऐसी स्थितियों में समझदार आदमी सामने वाले को धीरज देता है न कि तुम्हारी तरह जान खाता है।

पंडिताइन ने कहा – अब बस भी करो! मेरा मुँह न खुलवाओ। कहूँ तो अपने पड़ोसी डॉक्टर सलीम साहब की क्लिनिक पर ले चलूँ? दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। इस तरह कोरोना की शंका लिए कब तक घुटते रहेंगे?

डॉक्टर सलीम का नाम सुनते ही पंडित जी की सिट्टी-पिट्टी गुल हो गयी। बात यह थी कि पिछले साल डॉक्टर साहब तबलीगी जमात होकर आए थे। इसी को लेकर पंडित जी ने बस्ती वालों में यह बात फैला दी थी कि जिस तरह कोरोना का जनक चीन है ठीक उसी तरह हमारे यहाँ उसे फैलाने का श्रेय तबलीगी जमात को जाता है। तब से लोग डॉक्टर साहब से सीधे मुँह बात नहीं करते थे। अब ऐसी स्थिति में पंडित जी किस मुँह से डॉक्टर साहब से अपनी शंका का इलाज करवाते। पंडितान को तभी एक उपाय सूझा। उन्होंने अपने पड़ोसी बिरजू पंडित से इस बारे में चर्चा करनी चाही। शायद कोई बीच का रास्ता निकल आए। दुर्भाग्य से पंडित जी घर पर नहीं थे। उनका लड़का था। वह किसी कार्य में व्यस्त होने के कारण पंडित जी के घर पर आने से मना कर दिया, किंतु कुछ जरूरी सलाह देकर पंडिताइन को घर भेज दिया।

पंडिताइन घर पर आकर पंडित जी से कहने लगी – आपकी समस्या का निवारण हो गया है। एक लोटा गोमूत्र लेकर सुबह-दोपहर-शाम आपको पिलाना है। शाम को ताली बजाकर दीप जलाना है। बाबा रामदेव की कोरोनिल दवा का सेवन करना है। इतने में भी अगर कुछ न हो पाया तो आप अपना मुँह गाय के मुँह के सामने रख दें। देखिए फिर आपका कोरोना कैसे छूमंतर होता है। यह सब तो ठीक है लेकिन मुझे एक छोटा सा संदेह है कि गोमूत्र चम्मच से पिलाना है या फिर लोटे से। ताली एक बार बजानी है या फिर तीन बार। दीपक घी का जलाना है या फिर तेल का। बाती एक लगानी है या दो, तीन,चार या फिर कितनी। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।

पंडित जी गुस्साए अपनी जगह से उठे और कहा – अरे भाग्यवान! मुझे बक्श दो! जान है तो जहान है! मुझे कोरोना का संदेह क्या हुआ मुझे मारने पर तुल गयी हो।

पंडित जी की यह बात सुन उधर से जा रहे डॉ. सलीम घर में घुस आए। उन्होंने कहा – आप चिंता न कीजिए। आप भगवान का इतना पूजा-पाठ करते हैं। आपके साथ कुछ भी बुरा नहीं होगा। अभी आप गरम पानी से गरारे कीजिए। काढ़ा पीजिए। कल सुबह आप मेरी क्लिनिक पर आइए मैं आपकी जाँच करता हूँ। आप किसी बात की चिंता मत कीजिए। हाँ एक बात और, मास्क और सेनिटाइजर का इस्तेमाल करना मत भूलिए। हमारे मजहब अलग हो सकते हैं, लेकिन हमारा प्यार तो अलग नहीं है न! इतना कहते हुए डॉक्टर सलीम वहाँ से चले गए। पंडित जी टकटकी लगाए उन्हें देखते रह गए।

 

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त

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