National Hindi Daily Newspaper
ब्रेकिंग न्यूज़

जिम्मेदारी ने अंकल बनाया

यह बोझ अब सहन नहीं होता क्या मैं सिर्फ जीवन भर बोझ उठाने के लिए हूँ. यह अपने आप में एक बड़ा प्रश्न है. तभी अंतरात्मा कहती है नहीं तू अकेला थोड़े न बोझ उठा रखा है. तेरे जीवन साथी भी तो इसमें बराबर के हिस्सेदार हैं . तभी जिम्मेदारी का एहसास कर वह सोचने लगता है. और बचपन के दिनो को टटोलता है. दादी की गोद –माँ की लोरी —-वो दोस्तो संग घंटो खेलना सब किसी चलचित्र की भांति उभर आती है. आज से तुलना करना कितना कठिन है. आज तो कान के पास चंद सफेद बाल —आंखो पर चश्मा —दिन भर की भागदौड़ और शाम की वो घर की वांसुरी है—जिसकी अपनी धुन है —ऐसे ही जिम्मेदारी का बोझ लिये कब सुबह हो जाता– पता ही नहीं चलता —-कितना बदल गया सबकुछ —-एक शब्द से –वो है.  जीवन चलाने का बोझ –सब सोचने के बाद वह हाथ में थैला लिये बाजार की ओर चल देता है. मुहल्ले के चंद बच्चे खेल रहे थे —उनकी गेंद आकर सामने से लगती है. वो चिल्लाते हैं. अंकल गेंद दे दो–वह ठिठक जाता है. एक समय के लिए खुद पर विश्वास नहीं होता —मै अंल बन गया और आगे बढ़ गेंद बच्चों की ओर उछाल देता है. और बाजार की ओर बढ़ता चला जाता है ।

आशुतोष

Print Friendly, PDF & Email
Skip to toolbar