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दंगाइयों की कोई जात धर्म नहीं होती

अब जबकि पूरा देश आर्थिक मंदी और बेरोजगारी से जूझ रहा है तब सरकार अपने किए गए फैसलों चाहे वह अच्छे हो या बुरे बिना उनकी परवाह किए उस पर डटे रहना चाहती है।
इस संवेदनशील समय में देश में एक अलग ही माहौल बना हुआ है। देश के कुछ राज्यो असम बंगाल केरल पंजाब राजस्थान उत्तर प्रदेश मेघालय त्रिपुरा और दिल्ली में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में लगातार प्रदर्शन चल रहे हैं इसी बीच दिल्ली को पिछले कुछ महीनों से हिंसा का सामना करना पड़ा है कुछ दिल्लीवासी सोशल मीडिया पर ऐसा भी कह रहे हैं कि जैसे दिल्ली ना हो सीरिया हो गया है। शायद उन्होंने सीरिया को टेलीविजन पर कभी देखा होगा तो आज सचमुच उससे तुलना करने लगे हैं।
लोग एक दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं लेकिन सवाल तो उन्हें अपने आप से करना चाहिए कि वे जब किसी उम्मीदवार को वोट देते हैं तो कभी यह सोचते है की वह सच में प्रशिक्षित है या नहीं वह उनके गली मोहल्लों में विकास कर पाएगा या नहीं। यही देखा जाता है कि जो उम्मीदवार जितनी अच्छी चिकनी चुपड़ी बाते करते है लोग उसे ही वोट देते हैं, वे लोग उस इंसान के इतिहास के बारे में पता नहीं लगाते कि कहीं वह किसी अपराध में शामिल तो नहीं। आज सरकार में ज्यादातर लोग क्रिमिनल बैकग्राउंड से ही आते है और वोट पाकर जीतते है और हम फिर सरकार को दोषी ठहराते है कि वह अपना काम ठीक से नहीं कर रही।
हाल ही में हुई दिल्ली दंगों के लिए अनुराग ठाकुर, परवेश वर्मा, वारिस पठान और कपिल मिश्रा के भड़काऊ भाषणों को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। जाहिर है कि वह नेता है और भरी सभा में मरने -मारने की बात करेंगे तो कोई ना कोई तो उक्सेगा ही और हुआ भी वहीं, लेकिन बात सिर्फ इतनी नहीं है कि किसी के भड़काने से कुछ लोग आते हैं और पूरी दिल्ली में आग लगा देते हैं लोगों के घर को लूट लेते हैं और सरेआम लोगों का खून करते हैं। असल बात तो यह है की यह दंगाइयों की फौज कब और कैसे तैयार हुई इसका पता लगाना हम सब के लिए अति आवश्यक है और यह लोग हम लोगों के बीच ही रहते है। पर किसके भीतर शैतान छिपा बैठा है यह किसी को नहीं पता। इनका कोई धर्म संप्रदाय या मजहब नहीं होता है यह सिर्फ लोगों को मारकर जीने को ही जीना समझते हैं।
सवाल यह भी है की चंद बच्चों को पीटने के लिए बड़ी संख्या में पुलिस फोर्स जाती है और बुरी तरह मारती है और कहती है कि यह पुलिस पर हमला कर रहे थे इसलिए इनको पीटना पड़ा। लेकिन वही इतनी बड़ी फौज जब दंगे हो रहे होते हैं तो उन्हें पकड़ने के लिए समय पर नहीं पहुंच पाती, इसी बीच पुलिस का एक कॉन्स्टेबल और आईबी का एक ऑफिसर बहुत ही बेरहमी से मारा जाता है और हास्यास्पद और सामान्य बात तो यह है कि हमेशा की तरह सब कुछ हो जाने के बाद पुलिस आती है और कहती है कि सब कुछ नियंत्रण में हो चुका है। आप को डरने की जरूरत नहीं है, तब तक लोगों के घर बर्बाद हो चुके होते है और लोगों की दुकानें जल चुकी होती हैं। पुलिस की इस नाकामी के लिए दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी तंज कसा है और सही समय पर कार्यवाही ना करने के लिए लताड़ लगाई है।
अगर किसी कानून से सचमुच किसी का भला हो तो कोई बुराई नहीं है किंतु जब बात देश हित की हो और देश ही खुश ना हो तो ऐसे कानून का क्या फायदा, ऐसा करके सिर्फ कुछ लोग सिवाय अपने जिद के और कुछ साबित नहीं कर सकते।
स्थानीय लोग अपने घर जल जाने की वजह से पलायन के लिए मजबुर हो चुके है, लोगो की वर्षों से कमाई संपत्ति आज धुएं में खाख हो चुकी है और कुछ लोग अभी भी इसे हिन्दू और मुसलमान के आइने से नाप रहे है लेकिन सच तो यह है की सब में खून तो लाल ही बहता है।

हर्ष शर्मा
33/4 ब्लॉक डी बांगुर एवेन्यू
कोलकत्ता
मो 91 98741 87193

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