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साहित्यिक पत्रकारिता की मशाल

पत्रकारिता ने भारत को आजादी दिलाने के अलावा हिंदी को भाषा का संस्कार दिया है। आजादी के आंदोलन के दौरान अखबारों में साहित्य को महत्व दिया जाता था। बड़े-बड़े साहित्यकारों के लेख और विचारों को पाठक पढ़ते थे। पत्रकारिता और साहित्य एक दूसरे को ताकत देते है। साहित्य समाज का दर्पण है तो मीडिया चैथा स्तंभ। दोनों के लिए तथ्य और तत्व की जरूरत होती है। साहित्यिक पत्रकारिता की शुरूआत भारत में 19वीं सदी में हो चुकी थी। इस तरह हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता के 150 वर्ष पूरे हुए। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को साहित्यिक पत्रकारिता का प्रवर्तक माना जाता है।
एक जमाना था ज्यादातर पत्रकार साहित्यकार थे और साहित्यकार पत्रकार। मीडिया और साहित्य में गहरा संबंध है। एक-दूसरे के बिना दोनों का काम चल नहीं सकता। सशक्त मीडिया ऐसी भूमि है जिस पर साहित्य का विशाल वटवृक्ष खड़ा हो सकता है। वास्तव में पत्रकारिता भी साहित्य की भाँति समाज में चलने वाली गतिविधियों एवं हलचलों का दर्पण है । वह हमारे परिवेश में घट रही प्रत्येक सूचना को हम तक पहुंचाती है। सत्य और तथ्य को बेलाग उद्घाटित करना रचनाधर्मिता है। साहित्यकार और पत्रकार का रचनाध्र्मिता का क्षेत्र अलग-अलग होते हुए भी दोनों में चोली-दामन का साथ है। दोनों ही सम सामयिक समाज का प्रतिनिधित्व करते हुए अपनी लेखनी के माध्यम से समाजहित में सामाजिक मूल्यों और सम्वेदनाओं को दृष्टि प्रदान करते हैं। रास्ते अलग-अलग होते हुए भी दोनों की मंजिल एक है। दोनों ही संघर्ष पथ के राही के रूप में जीवन मूल्यों को प्रशस्त करते हुए दीनहीन की आवाज को बुलन्द करते हैं। शोषण विहीन समाज की स्थापना में दोनों का अहम योगदान है। साहित्य और पत्रकारिता ज्ञान के भण्डार है और समाज में जनजागरण का कार्य करते हैं। हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता हिन्दी साहित्य के विकास का अभिन्न अंग है। दोनों परस्पर एक-दूसरे का दर्पण हैं। पत्रकारिता की विधा को भी साहित्य के अंतर्गत माना जाता है। बहुत से विचारको ने पत्रकारिता को तात्कालिक साहित्य की संज्ञा भी दी है। विचार किया जाए तो समय-समय पर विभिन्न साहित्यकारों ने पत्रकारिता में अपना योगदान और पत्रकारों का मार्गदर्शन भी किया है।
पत्रकार और साहित्यकार वस्तुतः जनता के प्रतिनिधि होते हैं। वे जनता के सुख-दुख की आवाज को अपनी लेखनी के माध्यम से व्यक्त कर समाज को सही राह दिखाते हैं। पत्रकार में लेखक, साहित्यकार, कवि और सम्पादक के सभी गुण समाहित होते हैं। कहने का तात्पर्य है जो व्यक्ति समाज हित में समाजोपयोगी साहित्य का सृजन, निर्माण और विकास करता है वही साहित्यकार और पत्रकार कहलाता है। पत्रकार का कार्य है समाज में घटित होने वाली सभी अच्छी बुरी घटनाओं को ज्यों का त्यों समाज के समक्ष परोसना। यदि पत्रकार इन घटनाओं के समाचारों को विश्लेषित कर उसे समाजोपयोगी बनाता है तो वह निश्चय ही साहित्य का सृजन कर रहा है। साहित्यकार अपनी रचनाओं को शाश्वत मूल्यों के साथ गद्य-पद्य विधाओं में सृजित करता है और फिर उसे प्रकाशन का रूप देता है। यह प्रकाशन समाचार पत्रों में क्रमिक रूप से होता रहता है। फिर उसे पुस्तकाकार का रूप देने का प्रयास करता है।
आजादी के आन्दोलन में पत्रकार और साहित्यकार समानधर्मी होते थे। महात्मा गांधी ने अहिंसक क्रांति के जरिये भारत को आजादी दिलाने के आंदोलन का नेतृत्व किया था। लोकमान्य तिलक, लाला लाजपतराय, डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद, महावीर प्रसाद द्विवेदी, वियोगी हरि और डाॅ. राम मनोहर लोहिया स्वतंत्रता सेनानी के साथ साथ पत्रकार और लेखक के रूप में भी प्रसिद्ध थे। उन्होंने अपनी लेखनी के जरिये देशवासियों में आजादी के आंदोलन का जज्बा जगाया था। आजादी के बाद हिन्दुस्तान, धर्मयुग दिनमान सारिका, कादम्बिनी, ब्लिटज, नंदन, पराग, नवनीत, रविवार जैसी पत्रिकाओं ने पत्रकारिता के साथ साहित्य का झंडा बुलन्द रखा। धरातलीय कसौटी पर देखा जाये तो एक पत्रकार में रिपोर्टर, सम्पादक, लेखक, प्रूफ रीडर से लेकर समाचार पत्र वितरक या हाॅकर तक के सभी गुण विद्यमान होते हैं। वह अपने हाथ से अपने समाचार पत्र में समाचारों के साथ-साथ सम्पादकीय भी लिखता है और समय-समय पर सम सामयिक विषयों पर आलेख भी निर्मित करता है। आजादी के आंदोलन के दौरान पत्रकार और साहित्यकार में कोई अन्तर नहीं था। यह अवश्य कहा जा सकता है कि बहुत से साहित्यकार सिर्फ साहित्य सृजन तक ही सीमित रहते हैं। वे लेखक, कवि, कहानीकार और उपन्यासकार का दायित्व निभाते हैं। मगर एक पत्रकार में ये सभी गुण समाहित होते हैं। वह समय-समय पर अपनी लेखनी के माध्यम से कवि, कहानीकार और लेखक भी बन जाता है। महात्मा गंाधी, लोकमान्य तिलक आदि को इसी श्रेणी में रखा जा सकता है।
आधुनिक भारत में भारतेन्दु, अज्ञेय, विधानिवास मिश्र रघुवीर सहाय, कमलेश्वर, श्याम मनोहर जोशी, बाल कृष्ण राव, चन्द्रगुप्त विकालंकार, खुशवन्त सिंह, कुलदीप नैय्यर, डाॅ. कन्हैया लाल नंदन और डाक्टर वेद प्रताप वैदिक आदि को इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। इन्होंने लेखक और पत्रकार के श्रेष्ठ दायित्व का समान रूप से निर्वहन किया है। आज भी बहुत से पत्रकार साहित्यकार के रूप में प्रसिद्ध हैं। इसलिए यह कहा जाना समीचिन है कि पत्रकारिता में साहित्य, लेखन आदि के सभी गुण समाहित होते हैं।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
डी .32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 8949519406

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