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पत्रकारों और किसानों के लिए सुरक्षा कानून बनाया जाए

पत्रकारिता और खेती दोनों शुरू से ही अपने आप में एक जोखिम भरा काम रहा है दोस्तों जान माल के जोखिम के साथ-साथ आर्थिक संकट भी ताउम्र पत्रकार का पीछा नहीं छोड़ता अक्सर देखने में आता है कि कवरेज पर गए पत्रकारों का कभी कैमरा छीन लिया गया कभी उनके साथ हाथापाई की गई कई बार तो पत्रकारों को अपनी ईमानदारी की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है दोस्तों आज जिस तरीके से कोरोना वायरस के संक्रमण को बढ़ने से रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन के कारण किसानों की आमदनी का एक हिस्सा बुरी तरह से प्रभावित हुआ है जो किसान खेती के साथ-साथ शहरों में भी या कोई छोटे-मोटे काम करते थे वह हिस्सा बुरी तरह से प्रभावित हुआ है दोस्तों किसान परिवारों की हर महीने औसत आमदनी 8931 रुपए है और इसका तकरीबन 50 फ़ीसदी हिस्सा मजदूरी और छोटे-मोटे काम धंधे करके आते हैं अब किसानों को यह भी नहीं मिल रहा हैl
वही दोस्तों साधारण पत्रकार का जीवन तमाम जोखिम और अनिश्चितताओं से भरा रहता है फिर चाहे वह संवाददाता हो डेस्क पर कार्य करने वाला संपादकीय विभाग का मीडिया कर्मी हो अथवा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का क्षेत्रीय संवाददाता या कैमरामैन हो सभी की पीड़ा और परेशानियां ऐसी हैं दुनिया की समस्याओं को उजागर करने वाला मीडिया कर्मी और सभी के पेट को भरने वाला किसान अपने जीवन की दुश्वारियां और दर्द की छटपटाहट को दूर करने के लिए आवाज भी नहीं उठा पाता है कुछ गिने-चुने मीडिया कर्मियों और किसानों का जीवन स्तर और आय के साधन उनका वेतन एवं सेवा शर्ते आदि मात्र संतोषजनक हो सकते हैं परंतु क्षेत्र में विस्तृत रूप से जमीनी स्तर तक काम करने वाले पत्रकारों और किसान हमेशा कठिनाइयों भरा हुआ जीवन जीते हुए इस पेशे की चुनौतियों से लड़ते रहते हैं l
अभी हाल ही में एंकर और चैनल हेड अर्नब गोस्वामी पर जो हमला हुआ हमें उसकी समीक्षा नहीं करनी है और ना ही किसी को सही या गलत ठहराना है मैं तो सिर्फ और सिर्फ उस घटना की कड़े से कड़े शब्दों में निंदा करता हूं जिसमें किसी भी कारणवश एक पत्रकार के ऊपर हमला किया जाता है क्योंकि अगर उन्होंने कुछ गलत बोले थे तो सभी कानूनी रास्ते खुले हुए थे और संविधान के अनुच्छेद 21 में भी प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण की बात की गई है दोस्तों किसी पत्रकार पर हमला मतलब पत्रकारिता पर हमला और पत्रकारिता पर हमले का मतलब कहीं न कहीं से भारत के लोकतंत्र पर हमला और मैं भारत के एक आम नागरिक होने के नाते भारत के लोकतंत्र पर हमला कभी भी बर्दाश्त नहीं कर सकता हूं l

आज आजादी के 72 साल बीत जाने के बाद भी किसानों और छोटे पत्रकारों की हालात में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ है जो की चिंता का विषय है वैसे भी भारतवर्ष में तो पत्रकारिता का जन्म ही आजादी के संघर्ष के उस दौर में हुआ था जहां पत्रकारिता करना किसी जंग को लड़ने से कम कार्य नहीं था दोस्तों आज जब हम सब घरों में हैं तब देश के पत्रकार डॉक्टर चिकित्साकर्मी और सभी के पेट भरने वाले अन्नदाता आज भी अपने -अपने कार्यों में जी जान से लगे हुए हैं तो क्यों नहीं इन सभी के लिए एक सुरक्षा कवच बनाया जाए? दोस्तों पत्रकार वहां कलम और कैमरा लेकर रिपोर्टिंग कर रहा होता है जहां पुलिस और सेना का जवान एके-47 हाथ में लेकर भी महफूज महसूस नहीं करता उस भीषण त्रासदी और आपदा के दौर में भी आपको पल-पल की खबर जान जोखिम में डालकर देता है इसका मतलब यह नहीं है कि हम अपने पुलिसकर्मी के योगदान को इस वैश्विक महामारी में या आज तक जितने भी महामारी से लेकर युद्ध और आपातकाल में इनका योगदान कम रहा है हमेशा सराहनीय रहा है लेकिन हम इसलिए कहे कि पत्रकार एक कलम और कैमरा के भरोसे ही जंग लड़ता है इसलिए दोस्तों पत्रकार और किसान सुरक्षा कानून भी इस देश में बनाया जाना चाहिए पत्रकार जहां अपना जान जोखिम में डालकर हम तक खबरें पहुंचाता है वही किसान हमें जिंदा रखता है खेतों में अनाज पैदा करके इसलिए मीडिया कर्मियों और किसानों के सामाजिक आर्थिक एवं जीवन संबंधित सुरक्षा प्राप्त हो सके इसके लिए सरकार को पहल करने की जरूरत है मेरे आत्मीय मित्रों कोरोना योद्धा के रूप में डॉक्टर पुलिसकर्मी सफाई कर्मी और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ साथ मीडिया कर्मी भी जान जोखिम लेकर अपना फर्ज निभा रहे हैं वही देश का अन्नदाता इस लॉकडाउन में भी अपने खेतों में सभी को भरपेट भोजन का जुगाड़ करने के लिए खेतों मे डटे हुए हैं इसलिए स्वास्थ्य बीमा और आर्थिक सहयोग जैसी सुविधा इन योद्धाओं को भी देने की जरूरत है दोस्तों अभी हाल ही में मीडिया हाउस द्वारा 167 पत्रकारों के कराए गए कोरोना टेस्ट में 53 पत्रकार इस वायरस से संक्रमित पाए गए हैं इसी प्रकार अभी 2 दिन पहले ही 28 वर्षीय महिला डॉक्टर कई लोगों की जान बचाने के बाद खुद पॉजिटिव हो गई और इस दुनिया को अलविदा कर गई वही दोस्तों इस समय छोटे मझोले अखबार और चैनल दम तोड़ रहे हैं ऐसे में पत्रकारों के सामने जीवन और कैरियर सुरक्षा को लेकर कोरोना से बड़ी चिंता हैं केंद्र एवं प्रदेश सरकारों द्वारा कोरोना योद्धा तमगे के बावजूद पत्रकारों को बीमा सुरक्षा और आर्थिक सहयोग नहीं मिल रहा है उन्हें इसकी सख्त जरूरत है सरकार को इस ओर ध्यान देने की जरूरत है और अन्नदाता के लिए भी पहल करने की जरूरत है हर एक वैश्विक महामारी से लेकर या किसी भी तरीके का आपातकाल के वक्त भी हमारे अन्नदाता खड़े रहते हैं उनके लिए सरकार को भी खड़े होने की जरूरत है l

विक्रम चौरसिया
कवि विक्रम क्रांतिकारी
दिल्ली विश्वविद्यालय/आईएएस अध्येता
(लेखक सामाजिक आंदोलनों से जुड़े रहे वंचित लोगों के लिए आवाज उठाते रहते हैं व मीडिया से भी जुड़े रहे हैं)

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