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संकट आदर्श जीवनशैली के बिखरने का

हमारे देश की सांस्कृतिक परंपराएँ और आदर्श जीवन-मूल्य समृद्ध एवं सुदृढ़ रहे हैं। किंतु अंग्रेजों की हम पर गुलामी की पूरी एक सदी ने, पश्चिमी हवाओं ने हमारे जन-मानस में जहर घोलकर हमारे रहन-सहन और आचार-विचार को विकृत किया है, और इससे हमारी संयुक्त परिवार, आदर्श जीवनशैली एवं प्रेरक संस्कृति की परंपरा बिखर रही है। ऐसे परिवार ढूँढ़ने पर भी मुश्किल से मिलते हैं, जो शांति और संतोष के साथ आनंदित जीवन जीते हैं।
आजादी मिलने के साथ ही हमारे द्वारा यह कामना करना अस्वाभाविक नहीं थी कि हमारे नष्ट गौरव को हम फिर से प्राप्त करेंगे और फिर एक बार हमारी जीवन-शैली में पूर्ण भारतीयता स्थापित होगी। किंतु आजादी की सात दशकों बीतने पर हालात का जायजा लें, तो हमारे सामाजिक, पारिवारिक और वैयक्तिक जीवन में भारतीय मूल्य खंड-खंड होते दृष्टिगोचर होते हैं। हमारे घर-परिवारों में ऐसे-ऐसे संबोधन, अभिवादन, खान-पान और परिधान घर कर चले हैं कि हमारी संस्कृति और सांस्कृतिक पहचान ही धूमिल हो गई है। इंटरनेट की आँधी ने समूची दुनिया को एक परिवार तो बना दिया है, लेकिन इस संस्कृति में भावना का रिश्ता, खून का रिश्ता या पारिवारिक संबंध जैसा कुछ दिखता ही नहीं है। सभी अपने स्वार्थों के दीयों में तेल डालने में लगे हैं। संकीर्ण सोच के अँधेरे गलियारों में औंधे मुँह पड़े संबंध और मानवीय रिश्ते सिसक रहे हैं।
हमारी बोलचाल, अभिवादन के तौर तरीकों में इंटरनेट, दूरदर्शन और चलचित्र सबसे ज्यादा जहर घोल रहे हैं। नमस्ते, प्रणाम, चरण स्पर्श के बजाय ‘हाय’, ‘हलो’, ‘बाई’ की संस्कृति पनप रही है-क्यों? कारण है माता-पिता, अभिभावकों की उदासीनता अथवा इन अभिवादनों से तथाकथित आधुनिक कहलाने की मृगतृष्णा। आज आवश्यकता है अपने पारंपरिक अभिवादन एवं संबोधन के तौर-तरीके अपनाने की जो ज्यादा मधुर हैं, स्नेहपूर्ण हैं, आदर सूचक हैं एवं हमारी संस्कृति के अंग हैं। आज पारिवारिक संबंध पारे की तरह बिखर रहे हैं। आपस में दूरियाँ बढ़ रही हैं। सब अविश्वास और संदेहों के घेरे में जी रहे हैं। एक मकान में रहते हुए भी सब अपने-अपने दायरों में सिमटे हुए हैं। बाप-बेटे के बीच संवाद नहीं है, भाई-भाई से नहीं बोलता। देवराणी-जेठानी में अनबन है। घर-घर में कलह, अलगाव एवं द्वंद्वों की भट्टियाँ जल रही हैं। अधिकारों की भूख और कर्तव्यों की चूक जीवन मूल्यों को क्षत-विक्षत कर रही है। नगरों/महानगरों में रहने वाले आधुनिक परिवारों में आर्थिक प्रगति की पताकाएँ फहरा रही हैं। पर, अंतद्र्वन्द्व और गृह कलह की तेज आंधियाँ उन पताकाओं को अर्थहीन कर रही हैं। द्वेष, नफरत, अनबन, तलाक, संबंध विच्छेद जैसी स्थितियों के बीच जीवन का अर्थ ही गुम हो गया है। ईष्र्या और प्रतिस्पर्धा की सुइयाँ खुशियों के गुब्बारों में छेद कर रही हैं। समृद्धि के साथ शांति का कहीं कोई तालमेल नहीं है। रोजी-रोटी का संघर्ष तो भले ही समाप्त हुआ है, लेकिन वैभव एवं भौतिक प्रदर्शन के लिए हर व्यक्ति प्रतिद्धन्द्वियों में नहीं अपनों से लड़ रहा है।
जन्मदिवस पर केक काटकर और मोमबत्तियाँ जलाकर और बुझाकर हम कितने आधुनिक बन रहे हैं? एक ही क्यों, अनेकों दीप जलें, जन्मदिवस पर दीपमालिका हो। केक ही क्यों कटे, कलाकंद, जलेबी, इमरती और रसगुल्ले क्यों न बँटे। क्या ये सभी केक से कम स्वादिष्ट हैं। हम खुशी के अवसरों पर दीपक जलाते हैं, बुझाते नहीं। दीपक बुझना हमारे लिए मातम का प्रतीक है, खुशी का नहीं। फूँक देकर बुझाना तो और भी अशुभ है, हमारी संस्कृति में।
रीति-रिवाजों के ही साथ नृत्य-संगीत की भी बात की जा सकती है। जन्मदिवस पर, विवाह समारोहों पर, खुशी के अन्य अवसरों पर मन की प्रसन्नता की अभिव्यक्ति के लिए हमारे यहाँ सारे विश्व को देने व सिखाने के लिए लोकगीत, लोकनृत्य, शास्त्रीय संगीत, शास्त्रीय नृत्य आदि की अति समृद्ध परंपरा है, उन्हें छोड़कर ‘ट्विस्ट’, ‘डिस्को’ एवं ‘ब्रेक’ नृत्यों की अनर्गल अश्लीलता का समावेश हम हमारे जीवन में करके किन सांस्कृतिक मूल्यों की ओर जा रहे हैं। रोकें इन्हें और प्रोत्साहन दें गरभा, भाँगड़ा, घूमर, भरतनाट्यम, कथक, कुचिपुड़ी एवं भारतीय नृत्यों को। यह देश तानसेन व बैजूबावरा का देश है। इस देश को कर्ण कटु एवं तेज-कर्कश संगीत उधार लेने की आवश्यकता क्यों है? हमारे नृत्य-संगीत सत्यम-शिवम्-सुंदरम के साक्षात् स्वरूप हैं।
त्यौहारों ने हमारी कुछ-कुछ लाज रखी हुई है, क्योंकि भारत के प्रत्येक भू-भाग के अपने त्यौहार हैं, कुछ समान हैं तो कुछ उस भू-भाग की विशिष्टता लिए । परंतु इन्हें भी विकृत करने का कम प्रयास नहीं हो रहा । कुछ त्यौहार मद्यपान से जुड़ गए हैं, तो कुछ जुए से, कुछ कीचड़ से सने जाते हैं, तो कुछ लेन-देन के अवसर बन गए हैं । इतना ही नहीं हमारी त्यौहारों की समृद्ध परंपरा को धुंधलाने के भी सुनियोजित प्रयास हो रहे हैं । बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और बड़े व्यावसायिक संस्थान अपने लाभ के लिए देश में ऐसे उत्सवों/पर्वों को स्थापित कर रहे हैं, जिनका हमारी संस्कृति से मेल नहीं है । फेमिली डे, मदर डे, फादर डे, वैलेनटाइन डे-ऐसे आधुनिक पर्व हैं, जिन्हें बड़ी कंपनियाँ एवं इलेक्ट्रोनिक मीडिया महिमामंडित कर रहे हैं। अपने आपको आधुनिक कहने वाले परिवारों एवं लोगों के लिए दीपावली, होली, रक्षाबंधन जैसे पारंपरिक पर्वों की तुलना में ये आधुनिक पर्व ज्यादा महत्त्वपूर्ण एवं प्रासंगिक हैं। आखिर क्यों? हम अपने ही देश एवं अपनी संस्कृति के बीच बेगाने क्यों बने हुए हैं? अपने त्यौहारों में हम पराए कैसे हो जाते हैं?
पहनावे की तो बात ही न पूछो। बुजुर्ग लोग कहा करते थे कि विदेशों में पहनावा कम कपड़े पहनने का है। क्या हमारे दूरदर्शन व चलचित्र शरीर पर न्यूनतम कपड़ों को दिखाने की होड़ में नहीं लगे हैं? दर्शकों पर कुप्रभाव के कारण मात्र यही नहीं है, परंतु ये भी बड़े कारण हैं अपरिपक्व किशोरों-किशोरियों, युवक-युवतियों में अनावश्यक उत्सुकता के आकर्षण के एवं अंधानुकरण के। हमने क्यों अपनाया ‘टाइट जीन्स’, ‘मिनी स्कर्ट’ तथा ‘हाॅट पेंट्स’ को । क्या साड़ी-ब्लाउज, सलवार कुर्ता, काँचली-कुर्ती, ओढ़नी-घाघरा कम आकर्षक हैं?
विदेशों की उपभोक्ता संस्कृति की अंधी नकल ने भी हमारे खान-पान की संस्कृति को खूब विकृत किया है । बच्चे अच्छे से अच्छे शरबत की अपेक्षा कोल्ड डिंªक्स में अधिक रुचि रखते हैं । वाह! क्या आकर्षण है इन पेयों का और इन अंग्रेजी नामों का। मेकडोनाल्ड बच्चों के सिर चढ़कर बोल रहा है, पिज्जा, नूडल्स, चाउमीन ये सब आधुनिक खान-पान है। वेफर्स और चाकलेट को तो हम भूल ही रहे हैं। चुईंगम बबलगम का जिक्र करना भी जरूरी है। डाॅक्टर इनमें से कई को हानिकारक बताते हैं और कुछ अंधाधुंध मूल्य में ऊँचे। फिर भी हमारी शान देखिए कि इन्हें खाए बिना काम नहीं चलता। क्या इसी कीमत में फलों का रस, बादाम, गुलाब के पत्तों व पोस्त के दानों की ठंडाई नहीं बन सकती। इन सभी वस्तुओं की हमारे देश में कमी है ? यह सब हमारी बदली मानसिकता का द्योतक है। दवातों ‘प्रीतिभोज’ में ‘बुफे’ भोजन की संस्कृति भी खूब चल पड़ी है। भारतीय परिस्थितियों में यह पूर्णतः ‘गिद्ध भोज’ दिखाई देता है। विदेशों में खान-पान का तौर-तरीका, आचार-विचार, खाद्य-सामग्री आदि सभी में अंतर है। वहाँ कोई पानी शायद ही पीता है और हमारे प्रमुख पेय ‘पानी’ का प्रदूषण भी खूब होता है। भोजन सामग्री का अस्वच्छ हाथों से स्पर्श, सारे भोजन स्थल पर छितराई प्लेटें, गिलास और उनमें छोड़ी जूठन, बीच-बीच में बैठे लोग विचित्र, अस्वास्थ्यकर, अस्वच्छ व अनाकर्षक दृश्य उपस्थित करते हैं। इसके अपेक्षा पंक्तिबद्ध होकर बैठना, खाना आदि अधिक स्वच्छ, संवेदनशील व स्वस्थ परिस्थितियाँ उत्पन्न करता है।
परिवार वह इकाई है, जहाँ एक ही छत के नीचे, एक ही दीवार के सहारे, अनेक व्यक्ति आपसी विश्वास के बरगद की छाँव और सेवा, सहकार और सहानुभूति के घेरे में निश्चित रहते हैं। परिवार वह नीड है, जो दिन-भर से थके-हारे पंछी को विश्राम देता है। लेकिन मियाँ, बीवी व बच्चों की इकाई ही आज परिवार है, इस संस्कृति वाले दौर में माँ-बाप, भाई-बहन की बात करना बेमानी लगता है। परंतु लगता है जहाँ पति-पत्नी दोनों ही अर्थोपार्जन के लिए नौकरी या व्यवसाय करते हैं, उन्हें संयुक्त परिवार और कम से कम माता-पिता या किसी बुजुर्ग की याद आने लगती है। हाँ ‘बेबी सिटर’, ‘आया’ या ‘क्रेच’ भी यह काम कर लेगा, परंतु परिवार की गरमाहट तो वह दे नहीं सकता । सुसंस्कार व स्नेह के बजाय कुसंस्कार व स्वार्थ पूर्ति की संभावना भी बनी ही रहती है ।
हमारी संस्कृति ‘प्रेम’ पर आधारित है घृणा पर नहीं। संबंधों की स्निग्धता और मधुरता पारिवारिक संरचना की आधारभित्ति है। स्वयं से प्रेम करिए, उस ‘स्व’ को ऊँचा उठाइए। प्रेम के दायरे को बढ़ाते चलिए, पहले माता-पिता, भाई-बहन, परिजन, पड़ौस, गाँव, जिला, प्रांत और हमारा देश। स्वस्थ परिवारों एवं भारतीय संस्कृति की संस्कार-सुरभि ही समाज और राष्ट्र की काया को स्वस्थ/प्रफुल्ल रख सकती है। और इसी से बिखरते संयुक्त परिवार एवं जीवन मूल्यों को बचाया जा सकता है।

 

ललित गर्ग
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