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व्यंग्य : जिंदगी का लॉकडाउन

हृदय को छू लेने वाली व्यंग्य रचना


सुबह से दिमाग खराब था। कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। लॉकडाउन के चलते न घर में रहे बनता था न ही बाहर। करूँ तो क्या करूँ?
मुझे कभी घर में इस तरह रहने की आदत न थी। वो तो कोरोना था, जिसने जीना हराम कर दिया था। एक तो बाजार बंद ऊपर से घर में एक ही तरह की जीवनशैली- वही उठो, नहाओ-धोओ, खाओ, टीवी देखो और सो जाओ। इसके सिवा कोई दूसरा काम भी था! उस दिन पहली बार लगा कि घर में रहना उतना आसान काम नहीं है। घर में एक-दो दिन रहना अच्छा लगता है, लेकिन इस तरह से कौन रहता है भाई? मैं यही सब उधेड़बुन में लगा था कि पड़ोस के मित्र ने आवाज़ लगाई। बाहर जाकर देखा तो मेरे घर से कुछ दूरी पर लोगों का जमावड़ा लगा हुआ था। मुझे भी जिज्ञासा हुई कि जाकर देखूँ आखिर हुआ क्या है। किंतु दूसरी ओर पत्नी की गंभीर हिदायतें घर से बाहर निकलने में खलल डाल रही थीं। जैसे-तैसे पत्नी को समझा-बुझाकर मुँह पर मास्क और हाथों में दस्ताने पहने घटनास्थल जा पहुँचा।
मैं जहाँ पहुँचा वह मकान मेरे करीबी मित्र का था। उसे उसने भाड़े पर चढ़ा रखा था। उस मकान में उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार, राजस्थान के चार परिवार रहते थे। ये परिवार नौकरी की तलाश में अपना घर-बार छोड़कर यहाँ आए थे। तभी उन्हीं परिवारों में से एक मजदूर जो शरीर पर कपड़ों के नाम पर एक गंदी सी बनियान और एक मटमैला सा पैंट पहिने था, मेरे पास आकर खड़ा हो गया। उसकी आँखें मानो मुझसे कुछ पूछ रही थीं।
दिमाग पर जोर डालने पर मुझे कुछ याद आया। लॉकडाउन के एक दिन पहले वह मुझसे मिलने मेरे घर पर आया था। वह मुझसे कुछ काम देने की चिरौरी कर रहा था। अब कुछ काम ही न हो तो उसे क्या दूँ! काफी सोचने-समझने के बाद मैंने उसे पाँच सौ रुपये दिए। उसने कृतज्ञता की दृष्टि से मेरी ओर देखा और झट से मेरे पैरों की ओर नीचे झुका। मैंने उसे थामते ऐसा करने से रोक दिया। मैंने कहा कि आगे कुछ काम होगा तो उस समय इन रुपयों का हिसाब-किताब देख लेंगे। वह मुझे धन्यवाद कहकर वहाँ से चला गया।
रंग, शक्ल, शारीरिक गठन तथा पेटी की मजबूरी ने उसे मजदूर बना रखा था। वैसे गाँव में उसकी कुछ जमीन थी। किंतु आए दिन अकाल और सूखा के कारण खेती करना असंभव हो गया था। पेट की मजबूरी इंसान जो न कराए वह कम है। उससे पूछने पर पता चला कि वह अपनी पत्नी और ढाई साल की बिटिया के साथ अपने गाँव जाने के लिए पैदल-पैदल जा रहे थे। कई किलोमीटर चलने के बाद बिटिया से रहा नहीं गया। उसने भूख, प्यास और थकान के चलते दम तोड़ दिया। यह कहते-कहते वह बिलख-बिलखकर रोने लगा। वहाँ जुटी भीड़ की आँखें गमगीन थीं। ऐसी हृदय विदारक घटना ने उन्हें झकझोर कर रख दिया था।
उस दिन पहली बार आभास हुआ कि जिंदगी में लॉकडाउन किसे कहते हैं। ऐसा लगा कि जिंदगी ने मुझे एक जोरदार तमाचा मारा है, गालों पर पड़े छापों ने कलम पकड़ने वाली उँगलियों तक को तोड़ डाला है। सच है, जिंदगी किसी के लिए वरदान है तो किसी के लिए अभिशाप।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार
चरवाणीः 73 8657 8657, Email: [email protected]
(https://google-info.in/1132142/1/डॉ-सुरेश-कुमार-मिश्रा-उरतृप्त.html)

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