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व्यंग्य : एक ही उल्लू काफी था…

‘एक ही उल्लू काफी था बर्बाद गुलिस्तां करने को।
अंजाम गुलिस्तां क्या होगा, जब हर डाल पर उल्लू बैठा हो।।‘
बहुत साल पहले नेताजी शब्द का बड़ा महत्व था। वैसे अब भी है। किंतु दूसरे अर्थों में। कहीं नेताजी का अर्थ आप सुभाष चंद्र बोस से ले रहे हैं, तो मुझे क्षमा कीजिए मैं उनकी बात नहीं कर रहा हूं। दरअसल आजकल के नेताजी की बात कर रहा हूं। एक समय था नेताजी का अर्थ सत्य, अहिंसा, धर्म और न्याय शब्द का पर्याय हुआ करता था। किंतु आज इन पर्यायों के विपरीत काम करने वाला ही नेताजी कहलाता है। गली से लेकर संसद तक और अखबार से लेकर टीवी तक इनका गाली-गलौच पुराण निरंतर हमारे कानों में ‘अमृत’ घोलता रहता है। गली के दो कौड़ी के लौंडे शीर्षस्थ नेता बन सकते हैं, बशर्ते उनके पास होनी चाहिए गाली-गलौच की सर्वश्रेष्ठ डिग्री। आज वही नेता महान माना जाता है जो लोगों की जुबान पर घर कर जाए।
आज के समय का लोकप्रिय नेता वही है जो आए दिन संविधान की धज्जियां उड़ाकर लोगों को धर्म, जात-पात, ऊंच-नीच, भेदभावों के नाम पर लड़ाने की कला जानता है। जो नेता यह कला नहीं जानता वह काल के गर्भ में समा जाता है या फिर ‘मैं अभी जिंदा हूं’ की तर्ज पर जब-तब कुछ बोल बालकर लापता हो जाते हैं। ऐसे नेताओं को डिस्कवरी चैनल भी ढूंढने में विफल हो जाता है। आजकल के राजनैतिक विराट पर्व में ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ जैसी शक्तिवाले कीचक नेताओं का ही बोलबाला है।
आज धारणा बदल चुकी है। जो लोगों के बारे में सोचें नेता नहीं फालतू कहलाते हैं। ऐसे लोगों को बुद्धिजीवी की संज्ञा देकर दरकिनार कर दिया जाता है। चौबीसों घंटे टीवी चैनलो, सोशल मीडिया में मंदिर-मस्जिद, हिंदू-मुस्लिम खेलनेवाले आज के अग्रणी नेता कहलाते हैं। ये वो गिद्ध होते हैं जो ज़िंदा लोगों को लाशों की भांति नोच- नोचकर खा जाते हैं। चिता की अग्नि से अपनी सियासीरोटियां पकाते हैं।
सही समय पर क्रोध करना भी एक कला है। इसी कारण राजा-महाराजाओं के समय क्रोधभवन हुआ करते थे। क्रोध के समय संवेग अत्यधिक उत्तेजित होते हैं। जो नेता इन संवेगो का सही स्थान पर सही समय पर सही उपयोग करता है वही सफल नेता माना जाता है। आज हाथ जोड़नेवाले नेता लुप्तप्राय होते जा रहे हैं। उनके स्थान पर हाथ उठानेवाले नेताओं का बोलबाला है। चोरी-डकैती, अत्याचार-बलात्कार, झूठ-फरेब आदि इनके आभूषण हैं।
‘सच बातों पर चुप्पी और झूठ बातों पर चिल्लाए हैं,
ये इसी देश के नेता हैं या चिड़िया घर से आए हैं।।‘
नेताओं ने देश के बड़े-बड़े मुद्दों को रामायण के राम, भगवदगीता के कृष्ण, कुरान के अल्लाह और बाइबल के ईसा मसीह के नाम पर ऐसे उलझा दिया है कि आम जनता उसी में अस्त-व्यस्त रहती है। अनपढ़ गंवार नेता भी वाल्मीकि, व्यास महामुनि और पैगंबर मोहम्मद को ज्ञान बांटते फिरते हैं। इन नेताओं की स्थिति उन छात्रों की जैसी होती है जो परीक्षा के लिए केवल गाय के बारे में निबंध सीखकर गये हैं और परीक्षा में घांस, बगीचा, मौसम के बारे में पूछ लिया गया। फिर चाहे जिस किसी विषय पर निबंध पूछा जाए, वह हर हाल में निबंध तो गाय के बारे में ही लिखेगा। हमारे नेताओं को यदि बेरोजगारी, कृषि, अर्थ-व्यवस्था, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे किसी भी विषय के बारे में पूछिए वे तो प्रत्युत्तर में आपको मंदिर-मसजिद, जात-पात, ऊँच-नीच जैसे विषयों के दलदल में उलझाकर रख देंगे। चूँकि जिन्हें जो आता है वे वही कर सकते हैं-
नेताजी गरीबों की भलाई करने से पहले विपक्ष की धुलाई करने में विश्वास रखते हैं। न रहेगी बांस न बजेगी बांसुरी। अब नेताओं ने शासन करने का नया ढंग अपनाया है। मीडिया को ललचाकर, बहलाकर, फुसलाकर या फिर धमकाकर अपनी हां में हां मिलाने पर मजबूर कर दिया है। जो मीडिया इसका विरोध करता है उसका जीना दुश्वार हो जाता है। जो नेता बातूनी होते हैं वे लोगों को अपनी मुट्ठी में कर लेते हैं। वह इतना चमत्कारी होता है कि चांद को धरती और धरती को चांद, मिट्टी को पहाड़ और पहाड़ को मिट्टी बनाने की क्षमता रखता है। यह चमत्कार उन्हें झूठ की कला से प्राप्त हुआ है। सामान्यत: लोग झूठ बोलने से कतराते हैं लेकिन इनमें नेतागण कतई नहीं आते और यह परंपरा नेताओं के परिवारों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी बदस्तूर चलती रहती है। अगर झूठ पकड़ा गया तो ऐसे-ऐसे बहाने सुनने को मिलते हैं कि सामान्य व्यक्ति आश्चर्य से आंखें फाड़े यही कहता है, ‘‘अच्छा ऐसा भी होता है।’’ अपने स्वार्थ के लिए दूसरे के सत्य की चीरफाड़ कर उसे झूठ में बदल देने में भी हमारे राजनीतिज्ञ माहिर होते हैं-
‘राजा बोला रात है, रानी बोली रात है,
मंत्री बोला रात है, संत्री बोला रात है,
यह सुबह-सुबह की बात है।‘
नेताओं के लिए भाषण की ए,बी, सी, डी, ई जरूर जरूर आनी चाहिए। ए फॉर एक्शन और एरिया यानी आप जिस सब्जेक्ट एरिया के बारे में आप बोलने आए हैं, आपके पास एक्शन प्लान है कि नहीं, जानकारी है कि नहीं, उस एरिया की समस्या और उसका समाधान है कि नहीं। दूसरा बी यानी बोल्डनेस, ये आपके कॉन्फीडेंस का पैमाना है, मंच पर बोलते वक्त आत्मविश्वास से लबालब होने चाहिए। तीसरा सी यानी क्रिएटिव, क्रिएटिवटी बहुत जरूरी है, कुछ जुमले, कुछ शेर, कुछ कविताएं, कुछ जोक, कुछ प्रेरणा देने वाले किस्से आपके दिमाग में हमेशा होने चाहिए, और आपकी क्रिएटिवटी इसमें है कि आप मौके की नजाकत को देख कर फौरन मौके पर चौका मार सकें। डी फॉर डाटा यानी आँकड़ा। जब भी कुछ कहना हो डाटा के आधार पर कहने से बल पड़ता है। और अंतिम है ‘ई’। ‘ई’ का संबंध एनर्जी से है। आप कितने भी अच्छे वक्ता क्यों न हो, कितने ही तथ्य क्यों न जानते हो कितुं आपकी एनर्जी में कमी होगी तो धरा का धरा रह जाएगा। जो नेता इन सब में झूठ का पंचामृत मिला देते हैं, उनकी तो चाँदी ही चाँदी है। वे कामयाब नेता बन जाते हैं।
चुनाव के समय कतार में खड़े होकर हम जिन नेताओं को चुनते हैं वही नेता जीतने के बाद पैरों पर पैर धरकर हमें जीवन की कतार से बाहर कर देते हैं। इतना होने के बावजूद भी भोली-भाली जनता उन्हीं को चुनती है। उनके सामने विकल्प नहीं है। जनता करे भी तो क्या करें-
कागज के इंसानों पर आग की निगरानी है।
अंधे सत्ता के हाथों मासूमों को जान गवानी है।।‘

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार
चरवाणीः 73 8657 8657, Email: [email protected]

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