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व्यंग्य : सिंघम बनोगे या चीवींगम!

कुछ दिन पहले हैदराबाद में आई.पी.एस. प्रशिक्षण समाप्ति समारोह को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से कहा कि पुलिस की वर्दी ऐसी है जिसे पहनते ही अंदर का खून बड़ा फड़फड़ाता है। नौकरी ज्वाइन करते ही सिंघम बनने की फिराक में रहते हैं। हालांकि प्रधानमंत्री ने यह बात नवप्रशिक्षित आई.पी.एस. अधिकारियों को संबोधित करते हुए कही थी जबकि सच्चाई यह है कि हमारे सामान्य से लगने वाले कांस्टेबल भी सिंघम बनने की फिराक में खुद में इतने सुराख करवा रहे हैं कि उनका भर पाना बड़ा कठिन है। वास्तव में पुलिस शब्द का अर्थ है लोगों द्वारा कानून का पालन करवाने वाला। जबकि पालन करवाने वाला खुद सिंघम स्टाइल में उसे तोड़ रहा हो तो यह परिभाषा पुड़िया बनाने से ज्यादा किस काम की। इस परिभाषा से इतर सरकारों को नीचा दिखाने वाले संगठन में बदलती जा रही है | महाराष्ट्र में सुशांत राजपूत का मामला तो राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है। इसके सिवाय आज मीडिया और पुलिस को तो कोई दूसरा काम ही नहीं है। देश में 14 करोड़ से ज्यादा नौकरियाँ गंवा चुके बेरोजगारों से गैरों की शादी में अब्दुल्ला दीवाना की तर्ज पर सुशांत का मामला दिखवा रहे हैं। अभी तक यह गणित साफ नहीं हो पाया है कि सुशांत का मामला बेरोजगारों को नौकरी कैसे दिला पाएगा। वहीं मध्यप्रदेश में “हनी-ट्रेप”का गर्मागर्म किस्सा पुलिस को फनी-फनी कर रहा है। छत्तीसगढ़ में कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर दुनिया भर के केस ऐसे गढ़ दिए गए कि अबके बिछुड़े फिर कहाँ जाकर मिलेंगे। ये मामले पुलिस के सिंघम बनने और राजनीति के चीवींगम से चिपकने की नग्न सत्यता है। सिंघम स्टाइल का खामियाजा छत्तीसगढ़ सरकार एक –एक लाख रूपये का मुआवजा देकर भुगत रही है।सिंघम पुलिस की करतूतों का एक उदाहरण उस समय सामने आया जब सुशांत राजपूत मामले में महाराष्ट्र पुलिस और राजनीति गठबंधन ने बिहार पुलिस के साथ दुर्व्यवहार किया था। चोर चोर से और सिंघम सिंघम से सीनाजोरी करना काफी भारी पड़ता है। अब उसी का खामियाजा सी बी आई द्वारा उधेड़ी जा रही परतें अपराध जगत राजनीति और पुलिस के घालमेल की कुत्सित कथा पर से नकाब हटा रही हैं। यहाँ भी सारी जाँच जिस दिशा में जा रही है वो भी राजनीति, पुलिस और अपराध जगत के गंदे समीकरण ही हैं। यहाँ पुलिस सिंघम बनने का खामियाजा अच्छी तरह से भुगत रही है। मध्यप्रदेश के इंदौर में दर्ज “हनी ट्रेप” का मामला भी ऐसा ही राजनीतिक खेल समझ आता है। एक सेवा निवृत मुख्य सचिव स्तर के अधिकारी का मानना है “एक राजनीतिक दल के कारकूनो के पास से बेहिसाब धन मिलने की कहानी का यह उत्तरार्ध “हनी ट्रेप” है। सरकार बदलने के साथ जाँच की दिशा और जाँच अधिकारियों का बदलना इस मामले के पूर्णविराम की और जाने के संकेत हैं। वैसे मध्यप्रदेश पुलिस द्वारा जोर शोर से शुरू किये गये व्यापम कांड, मंत्री द्वारा अपने कर्मचारी से यौनाचार भी इधर उधर भटकते न्याय की दिशा को भटका रहे हैं। इस पर सरकार का यह तुर्रा की हमने दोषी मंत्रियों और अन्य को जेल भेजा सरकार के चेहरे पर लगी कालिख को कम नहीं करता। बल्कि यह सवाल पैदा होता है कि इन अपराधों के घटते समय प्रदेश का शीर्ष क्या सो रहा था? “देश भक्ति और जन सेवा” की शपथ लेने वाली पुलिस कहीं रिश्वत भुक्ति के चक्कर में तो कहीं सिंघम स्टाइल में ओवर स्मार्ट बनने के चक्कर में कालिख का ऐसा चीविंगम चिपका लिया है कि उसे छुड़ाना उनके बस की बात नहीं लगती।

(डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’)

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