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जनाब लॉकडाउन नहीं अनलॉक कहिए

लॉकडाउन के चलते कइयों का जीवन दुश्वार हो गया है। न घर में रहे बनता है और न ही बाहर। इंसान करे तो क्या करे? सोशल मीडिया में लॉकडाउन के नाम पर अजीबोगरीब सृजनशीलता परोसी जा रही है। कहीं पत्नी का मजाक तो कहीं पति का मजाक, कहीं गरीब का मजाक तो कहीं अमीर का मजाक। कहीं कुछ तो कहीं कुछ। सच तो यह है कि लॉकडाउन के समय सब कुछ लॉकडाउन नहीं है। यदि नज़र दौड़ाएँ तो आपको लॉकडाउन से परे कई चीजें मिलती हैं, जैसे- प्रेम, सूर्य की किरणें, दया, सृजनशीलता, सीखना, इच्छाएँ। क्या इन्हें लॉकडाउन किया जा सकता है? कभी नहीं। हरगिज़ नहीं।
प्रेम लॉकडाउन से परे है। यह उन्मुक्त है। इस पर ताला लगाने की ताकत दुनिया में किसी के पास नहीं है। यह स्वतंत्र तथा भावनाओं से ओत-प्रोत है। यह किसी में कम किसी में ज्यादा होता है। किंतु होता अवश्य है। जैसे कि माता-पिता का प्रेम, माता-पिता का बच्चे से प्रेम, भाई का भाई से प्रेम, भाई-बहन का प्रेम, पति-पत्नी का प्रेम, प्रेमी-प्रेमिका का प्रेम, मनुष्य का मनुष्य से प्रेम, मनुष्य का पशु से प्रेम। कैसे कोई इसे बांध सकता है? इसकी तालाबंदी करना दुनिया में किसी के बस की बात नहीं है। इसीलिए कुमार विश्वास के शब्दों मे कहा जाए तो मोहब्बत एक अहसासों की पावन सी कहानी है, कभी कबीरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी है। प्रेम के इस दीवानेपन पर किसका पहरा ठहरा है, जो अब ठहरेगा! इसलिए लॉकडाउन के इस सुनहरे अवसर पर अपना प्रेम जताना मत भूलिए।
कइयों को लगता है कि लॉकडाउन से जीवन बेरंग बन गया है। लॉकडाउन में कभी उगते सूर्य की किरणों का मजा लें तब जीवन बेरंग नहीं सतरंगी लगेगा। सूर्य की किरणों में सात रंग होते हैं। ये हमारे जीवन में स्वतंत्रता का आभास दिलाने के लिए बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी और लाल रंग बनकर पदार्पण करते हैं। ये कभी खुशी तो कभी गम तो कभी चिंता तो कभी नाराजगी तो, कभी खोना कभी पाने का अहसास दिलाते हैं। इन रंगों से मिलकर ही जीवन का ताना-बाना बनता है। जीवन का यह ताना-बाना कभी लॉकडाउन की परवाह नहीं करता है।
मनुष्य दया की कमी में दानवता के लॉकडाउन में जकड़ जाता है। वास्तव में दया से करुणा की उत्पत्ति होती है और जहाँ करुणा की सरिता बहती है, वहाँ परमपिता परमेश्वर विराजमान होते हैं। इसी करुणा से मनुष्य में एक अद्भुत शक्ति का उद्भव होता है, जो उसे दीन–दुखियों का सहारा बना देता है। दया से ही स्नेह, प्रेम, आत्मीयता और ममता जैसे कोमल मनोभावों का जन्म होता है। यदि हर व्यक्ति न केवल लॉकडाउन के समय बल्कि आजीवन अपने ह्रदय में दया का बीज बो ले तो उसे एक अच्छा मनुष्य बनने से कोई नहीं रोक सकता। जहाँ दया होती है, वहाँ अन्य सद्गुण स्वतः चले आते हैं। इसीलिए कहाँ गया है – दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान।
कहते हैं जो दिखता है वही फंसता है। जो नहीं दिखता उसे कैसे फांसेंगे? मनुष्य की भौतिकता को लॉकडाउन किया जा सकता है, किंतु उसकी सोच यानी सृजनशीलता को नहीं। सृजनशील व्यक्ति के अंदर नये-नये विचार, क्रियाएँ, कल्पनाएँ और आविष्कारों की योग्यता रहती है। लॉकडाउन के इस समय में हमें परम्परागत तरीकों से हटकर असाधारण विचार उत्पन्न करने के बारे में सोचना चाहिए। दृढनिश्चय और साहस के साथ आगे बढ़ने पर सफलता कदम चूमती है। बुद्धि और सृजनात्मक कला का मिलन सोने पर सुहागा जैसा होता है।
लॉकडाउन के समय तरह-तरह के ख्याल आना सहज है। ऐसे समय में यदि कुछ सीखने की इच्छा है, तो उसे अधूरा नहीं छोड़ना चाहिए। किसी ने सच ही कहा है- इससे पहले कि जीवन चूके, इससे पहले कि सब कुछ छूटे और जीवन लगने लगे बला, सीखें जीवन जीने की कला। जन्म लेना हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन इस जीवन को सुंदर बनाना हमारे हाथ में है और जब सुख की यह संभावना हमारे हाथ में है तो फिर यह दुख कैसा? यह शिकायत कैसी? हम क्यों भाग्य को कोसें और दूसरे को दोष दें? जब सपने हमारे हैं तो कोशिशें भी हमारी होनी चाहिए। जब पहुंचना हमें है तो यात्रा भी हमारी ही होनी चाहिए। क्यों न इस लॉकडाउन के समय को कुछ नया सीखने या फिर अधूरी इच्छा को पूरा करने या फिर कुछ पढ़ने, लिखने या कुछ काम करने के नाम करते हैं! यह सब अभी संभव है। सोचने-समझने और कुछ कर गुजरने के लिए इससे अच्छा अवसर फिर कभी नहीं मिलेगा।
एडम स्मिथ ने कहा था कि मनुष्य की इच्छाओं का कोई अंत नहीं है। वैसे इच्छाओं के साथ समझौता करने की आवश्यकता भी नहीं है। समय जो लॉकडाउन का है! जब समय ही लॉकडाउन का है तो क्यों न हम अपनी योग्य इच्छाओं को पाल-पोसकर उसे इतना बड़ा करें कि वह हमें चैन से बैठने ही न दे। भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा था कि सपने वो नहीं जो नींद में आते हैं, सपने तो वो हैं सोने नहीं देते। इन सपनों को साकार करने के लिए इच्छाओं की आग दहकती रहनी चाहिए। जैसे भूखे को रोटी की इच्छा, गरीब को अमीर होने की इच्छा, मोटे को पतले होने की इच्छा, काले को गोरे होने की इच्छा, नाटे को लंबा होने की इच्छा, ढेर सारा खा कर भी तोंद न बढ़ने की इच्छा, बेरोजगार को नौकरी की इच्छा, एकतरफा प्रेम में प्रेमी को उसकी प्रेमिका मिलने की इच्छा, कुछ काम न करने पर भी नेता को जीतने की इच्छा! इच्छा! इच्छा! क्यों न इस लॉकडाउन के बेशकीमती समय में हमारी वाजिब इच्छाओं को ही पूरा कर लें! इसलिए भूल से भी न कहना कि यह समय लॉकडाउन का है। यह समय तो खुद को अनलॉक करने का है।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार
चरवाणीः 73 8657 8657, Email: [email protected]
(https://google-info.in/1132142/1/डॉ-सुरेश-कुमार-मिश्रा-उरतृप्त.html)

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