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स्कूली छात्रों पर मंडराया डायबिटीज का खतरा

अभिभावक सावधान हो जाये क्योंकि एक खतरनाक बीमारी ने छात्रों को अपने चंगुल में फंसाना शुरू कर दिया है। छात्र एक ऐसी बीमारी में फंसने जा रहे है जो देखने में तो साधारण दिखाई देती है मगर है बड़ी भयावह। इस खतरनाक बीमारी का नाम है डायबिटीज। जिसे अब सभी लोग पहचानने लगे है। इस बीमारी के लोगों की अस्पतालों में लम्बी कतारें देखी जाने लगी है और इसने अन्य बीमारियों को पीछे छोड़ दिया है। डायबिटीज या मधुमेह केवल बुजुर्गों की बीमारी नहीं है। जीवनशैली के कारण होने वाली यह बीमारी बच्चों को भी अपनी चपेट में ले रही है। बच्चे मोटे हो रहे हैं। वजन बढ़ने व सक्रियता में कमी आने से बच्चों में मधुमेह का रोग बढ़ रहा हैं। इस बीमारी के लक्षण बताते हुए विशेषज्ञ कहते है यदि कोई बच्चा बहुत ज्यादा पानी पीता है, बार-बार और जल्दी-जल्दी पेशाब जाता है, उसका वजन बढ़ रहा है या उसे बहुत जल्दी भूख लगती है तो यह चिंता के लक्षण हैं। यदि बच्चे तीन घंटे या इससे ज्यादा रोज टीवी देखते हैं या कंप्यूटर, गेम कंसोल्स, टैबलेट या स्मार्टफोन पर समय बिता रहे हैं, तो यह उनकी सेहत के लिए अच्छी बात नहीं है। एक रिसर्च के मुताबिक, इस तरह घंटों टीवी स्क्रीन के सामने बिताने से उनमें डायबिटीज पनप सकता है। अभिभावकों को यह देखने की जरूरत है कि बच्चों का वजन तो नहीं बढ़ रहा। 10 साल की उम्र के बाद उन्हें बच्चों की नियमित चिकित्सा जांच करानी चाहिए।
स्वास्थ्य मंत्रालय के एक हालिया सर्वे के अनुसार भारत में तेजी से पांव पसार रहे डायबिटीज के एक खुलासे ने सब को चैंका दिया है। सर्वे के मुताबिक मधुमेह केवल बुजुर्गों की बीमारी नहीं है। जीवनशैली के कारण होने वाली यह बीमारी बच्चों को भी अपनी चपेट में ले रही है। बच्चे मोटे हो रहे हैं। वजन बढ़ने व सक्रियता में कमी आने से बच्चों में मधुमेह का रोग बढ़ रहा हैं। जाने वाले हर दस में से एक छात्र पर डायबिटीज का खतरा मंडरा रहा है। प्री-डायबिटिक चरण में चल रहे इन बच्चों का ब्लड शुगर 100 से 126 मिलीग्राम के बीच दर्ज किया गया है। 2018 के आंकड़ों पर आधारित इस सर्वे में सबसे ज्यादा 22 फीसदी प्री-डायबिटिक बच्चे मणिपुर में मिले। पश्चिम बंगाल में ऐसे बच्चों की संख्या 21.7 फीसदी तो गुजरात में 20.8 प्रतिशत दर्ज की गई। वहीं, गोवा में ऐसे बच्चे सबसे कम संख्या (1.8 फीसदी) में पाई गई जिनके आगे चलकर डायबिटीज का शिकार होने की आशंका है। अन्य क्षेत्रों में अक्सर खराब प्रदर्शन करने वाले यूपी-बिहार की स्थिति बेहतर है। यूपी के 4.2 फीसदी तो बिहार के 6.6 फीसदी बच्चे प्री-डायबिटिक चरण में हैं। राष्ट्रीय पोषण सर्वे से यह भी पता चलता है कि शहरों और गांवों में प्री-डायबिटिक बच्चों की संख्या लगभग बराबर है। शहरी क्षेत्रों में जहां 10.9 बच्चे प्री-डायबिटिक हैं, वहीं ग्रामीण इलाकों में ऐसे बच्चें की संख्या 10.2 फीसदी दर्ज की गई है।
खान पान की जिस प्रकार की जीवन शैली देशवासियों ने विकसित की है वह बेहद डरावनी है। ध्यान देने की बात यह भी है की संपन्न और शिक्षित लोग भी बच्चों के पोषण को लेकर सजग नहीं। सर्वेक्षण का चैंकाने वाला तथ्य यह है कि दो साल से कम के नौनिहालों में मात्र 6.4 प्रतिशत शिशु ही सौभाग्यशाली हैं जिन्हें न्यूनतम स्वीकार्य पोषक आहार मिलता है। गरीब की छोड़ों, संपन्न वर्ग के घरों के बच्चों की पोषण की स्थिति ठीक नहीं है। डायबिटीज ने वैसे ही घर घर में लोगों को अपनी चपेट में ले रखा है और अब नौनिहाल भी इसके शिकार हुए तो भारत को डायबिटीज देश बनने से कोई नहीं रोक पायेगा।
मोदी सरकार चाहती है कि 2022 तक कुपोषण से बच्चों को पूरी तरह छुटकारा दिलाया जाए। मौजूदा रफ्तार से यह संभव नहीं लगता। सबसे बड़ा संकट तो यह है कामकाजी अभिभावक बच्चों को चिप्स, नूडल्स, अन्य फास्ट फूड देंगे तो फिर डायबिटीज जैसी अन्य बीमारियों के प्रभाव से मुक्ति दिलाना संभव नहीं होगा। अमेरिका में हुए एक रिसर्च के अनुसार डायबिटीज के सात नए मामलों में एक मामले के लिए आहार भी जिम्मेदार है। खान पान की वजह से इस बीमारी के पनपने की आशंका बढ़ जाती है। आहार की आदतों और सुस्त जीवनशैली को इस बीमारी का मुख्य कारक माना जाता है। आंकड़ों की बात करें तो दुनियाभर में फिलहाल 42 करोड़ मधुमेह के रोगी हैं। वर्तमान में भारत में ही 3 करोड़ से ज्यादा डायबिटीज के शिकार लोग हैं। संयुक्त राष्ट्र संगठन यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार डायबिटीज के शुरुआती लक्षणों का मूल कारण बच्चों को समुचित और संतुलित आहार न देना है।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
D-32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

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