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लघुकथा “गागर में सागर”भर देने वाली लोकप्रिय विधा : डॉ. शम्भू पंवार

नई दिल्ली। लघुकथा “गागर में सागर “भर देने वाली लोकप्रिय विधा है। लघुकथा कम शब्दों मे पाठक के ह्रदय को स्पर्श करती है।इस आशय का प्रतिपादन अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वरिष्ठ पत्रकार,लेखक- विचारक डॉ. शम्भू पंवार,झुन्झुनू ने किया।
डॉ.पंवार विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान,प्रयागराज उत्तर प्रदेश की छत्तीसगढ़ इकाई द्वारा ” लघुकथा लेखन और उसकी प्रासंगिकता” विषय परआयोजित अंतराष्ट्रीय आभासी गोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में उद्धबोधन दे रहे थे।डॉ. शम्भू पंवार ने कहा कि आधुनिक जीवन की आपाधापी व भागदौड़ में मनुष्य के पास समय की कमी है। परिणामतः पाठक कम समय में कम शब्दों में साहित्य का आस्वाद लेना चाहता है। लघु कथा एक साथ लघु भी है और कथा भी है यानी सम्पूर्ण कहानी का सार लघुकथा में मिल जाता है।अतः लघुकथा समकालीन पाठकों के बहुत करीब है।
धमतरी,छत्तीसगढ़ की वरिष्ठ साहित्यकार,प्राचार्या डॉ शैल चंद्रा ने अपनें मंतव्य में कहा कि लघु कथा,साहित्य की एक सशक्त विधा है। आकार लघु होने के कारण उसमें प्रभावोत्पादकता आती है। विषय वस्तु के चयन में लघुकथा लेखक को सावधानी बरतनी चाहिए।
भाषाविद डॉ. चितरंजन रायपुर, ने कहा कि,लघुकथा लेखक के लिए कम शब्दों में ज्यादा कहना एक बड़ी चुनौती है। अपने लेखन को छपने से पहले उसकी बार बार जांच होनी चाहिए। लघुकथा की कथा में रोचकता और यथार्थता होनी चाहिए। कम व सरल लिखना बहुत कठिन है। लघुकथा को बौद्धिकता से बचाना जरूरी है।
ओस्लो,नावें से वरिष्ठ पत्रकार,लेखक सुरेशचन्द्र शुक्ल, शरद आलोक ने कहा कि रचना और रचनाकार को अनुशासन में बांधना ठीक नहीं है। लघुकथा लेखन के लिए कोई निश्चित शब्द सीमा नहीं है। लघुकथा को छह शब्दों में भी लिखा जा सकता है।
नागरी लिपि परिषद् ,नई दिल्ली के महामंत्री डॉ. हरिसिंह पाल ने कहा कि लघुकथा पांच सौ शब्दों की भी हो सकती है। पंचतंत्र के आख्यान भी लघुकथा के रुप में आते हैं। रचना की उपज अंतरमन से होनी चाहिए। सिद्धांतो को पढ़कर कोई भी लेखक या कवि नहीं बन सकता।
विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, के महासचिव डॉ. गोकुलेश्वर कुमार द्विवेदी ने कहा कि आधुनिक लघुकथा का उद्देश्य बहुआयामी है। लघुकथा में पात्र सीमित हो पर उसका शीर्षक मात्र प्रभावी हो,जो समग्र कथा का प्रतिनिधित्व करें।
गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रख्यात चिंतक-विचारक एवं शिक्षाविद डॉ.शहाबुद्दीन नियाज मुहम्मद शेख ,पुणे ने अपने उद्बोबोधन में कहा कि, लघुकथा नई सदी में सामाजिक बदलाव को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। आधुनिक काल में हिंदी लघुकथा का आरंभ सन् 1900 के आसपास से माना जा सकता है। सीमित शब्दों में असीमित भवन खड़ा करना ही लघुकथा की मुख्य विशेषता है। इसलिए लघुकथा लेखन एक दुष्कर कार्य है। लघुकथा लेखक को निरंतर अभ्यास और गंभीर मनन ,चितंन के पश्चात लघुकथा का सृजन करना चाहिए।
गोष्ठी में डॉ. सहाबुद्दीन अंसारी,उत्तराखंड,डॉ.सुनीता प्रेम यादव औरंगाबाद,डॉ.सरस्वती वर्मा महासमुंद, महेश राजा, विभाषा मिश्र, डॉ.सुनीता तिवारी रायपुर,अनिल शुक्ला,अयोध्या चित्रकूट, सहित अनेक विद्वानो ने विचार व्यक्त किये।
डॉ. रश्मि चौबे, गाजियाबाद की सुमुधर सरस्वती वंदना से गोष्ठी का आरंभ हुआ।
विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज, की छत्तीसगढ़ ईकाई की हिन्दी सांसद डॉ. मुक्ता कान्हा कौशिक ने आभासी गोष्ठी के आयोजन में अपनी महनीय भूमिका निभाते हुए कहा कि लघुकथा छोटी कहानी का अति संक्षिप्त रूप है।शाब्दिक अर्थ की दृष्टि से लघुकथा और छोटी कहानी दोंनो एक ही साहित्य-रुप का बोध कराती है। गोष्ठी के सफल व सुंदर संचालन के साथ उन्होंने सभी का धन्यवाद ज्ञापन किया।

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