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लघुकथा : गरीब की बुझी बाती

शाम ढल चुकी थी। उसके झोपड़ी में घुप्प अंधेरा था। तभी किसी ने बाहर से आवाज लगाई-सुंदी ओ सुंदी! काहे घर में अंधेरा किए है, कुछ बारती क्यों नहीं। प्रति उत्तर कुछ न मिला। तब वह अपने मोबाइल की टार्च जलाते हुए उसकी झोपड़ी में घुसती चली गई-अरी! सुंदी काहे अंधेरा किए बैठी है री, कुछ जला कर उजेला कर ले, आज सभी के घर के बाहर दिए जल रहेेें हैं।”
’जिसकी जिन्दगी में हमेशा के लिए अंधेरा हो गया ,अब उसकी जिन्दगी में कौन सा दिया उजेला करेगा-सुंदी रूआंसे स्वर में बोली।
‘मैं तेरा दर्द समझती हूं। मेरा आदमी क्वारंटाइन में फंसा।.. खैर वो तो आ ही जायेगा, पर तेरा तो.. च्चा ..च्चा..
आंसू पोछते हुए तब सुंदी बोली-ई नेता-वेता अगर लाकडाउन से पहिले हम गरीबों का भी थोड़ा ख्याल कर लेते, तो मेरा खसम दिल्ली से पैदल लौटते हुए रास्ते में भूखे-प्यासे न मरता। अब किस कोरोना को भगाने के लिए, किसका हौसला बढ़ाने के लिए दिया जलाऊं, जब मेरी तो पूरी दुनिया ही उजाड़ हो गई हो। हम गरीब-मजूरों को तो बेमौत मरना ही किस्मत में लिखा है, कभी भूख से, कभी प्यास से, कभी सरकारी बदइंतजाम से। अब कह रहे हैं घर के बाहर दिए जलाएं। मैं तो कोछ उठा कर ईश्वर से यही कहतीं हूं, जिसने मेरी दुनिया उजाड़ी उसको भगवान तुम दण्ड देना। गरीब की हाय! बहुत खराब होती है-कहते-कहते वह फफक-फफक कर रोने लगी।
झोपडी़ में टार्च की फैली रौशनी बुझ चुकी थी। अब वहां दो अबलाओं का करूणा से लबालब भरा, हृदय को असीम अंतर तक बेधता रूदन राग रात्रि की नीवरता में विस्तारित हो रहा था। गांव मे पर्याप्त रौशनी का वास था, पर जिनके घरों में कोरोना के लाकडाउन से परदेसी नहीं लौटे, वहां का माहौल उदास और बेहद शान्त था।

सुरेश सौरभ
निर्मल नगर लखीमपुर खीरी पिन-262701
उत्तर प्रदेश
मो-7376236066

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