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बैठे अपने दूर !!

कोरोना से सीख ले, जीवन के प्रसंग !
पतझड़ भी आते यहाँ, है सावन के संग !!

जब नदियाँ उफान ले, करती पार निशान !
नाव डूब तल में लगे, छूटे हाथ सामान !!

शहरों की दौड़े रुकी, गाँवों बसा तनाव !
शांत-शांत सागर दिखे, मगर चली न नाव !!

खो बैठे पल में यहीं, जो पाया भरपूर !
बेगानों की क्या कहें, बैठे अपने दूर !!

सूना-सूना जग लगे, संकट करे उदास !
जब आती है जान पर, झूठे पड़े कयास !!

किस्मत का ये खेल है, या फिर खास कसूर !
जितने भी हम जब चले, दिल्ली उतनी दूर !!

दो गज दूर चले नहीं, अफवाहों के पैर !
वक्त बड़ा बलवान है, नहीं किसी की खैर !!

कोरोना से सीखिए, करता ये आगाह !
जानबूझ मत कीजिये, कोई पाप गुनाह !!

देखों कितनी काम से, है फुरसत लो आज !
रुकी-रुकी सब गाड़ियां, तैरे नहीं जहाज !!

पिघलेंगे पत्थर कभी, आएँगी तब याद !
अपने हाथों खो चले, अपनेपन का स्वाद !!

डॉo सत्यवान सौरभ

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