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सियासी लोभ के समक्ष कराहता लोकतंत्र

रमेश ठाकुर
आधी रात के वक़्त महाराष्ट्र में लोकतंत्र की किस तरह फजीहत हुई, पूरे देश ने देखा। शिवसेना की सरकार न बने इसके लिए सभी गैरकानूनी तरीको को अपनाया गया। बिना मीटिंग, बिना किसी संवैधानिक तरीके से राष्ट्रपति शासन को सुबह के भोर में हटाया गया। यूं कहें कि सुबह-सुबह लोकतंत्र मुंबई पहुंचा और राष्ट्रपति को फ़ोन करके कहा कि मैं महाराष्ट्र आ चुका हूं। यह सुनकर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने महाराष्ट्र से अपना शासन हटाने की चिट्ठी पर ज़ोर से मोहर मारी। जोर से ठप्प की आवाज़ आई, इस आवाज़ से मुंबई के राजभवन में सोए राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी की आँख खुल गई और वो लोकतंत्र स्थापना में लग गए। कुछ देर में उन्होंने लोकतंत्र स्थापित कर देश की आँखें भी खोल दीं। कुछ ऐसा ही बीती रात को घने अंधेरे में किया गया। बता दें, देश की आर्थिक राजधानी में देर रात न केवल लोकतंत्र की हत्या हुई,अपितु संविधान के मर्यादाओं को भी तोड़ा गया। शुक्रवार शाम जब एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने अगले मुख्यमंत्री के रूप में उद्भव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाने पर सहमति जताई थी, लेकिन शनिवार सुबह तक देवेंद्र फड़णवीस ने शपथ ले ली।

क्या कहते हैं संविधान विशेषज्ञ
मुझे लगता इस संपूर्ण मामले में राज्यपाल एवं राष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पदों ने भी अपने मर्यादाओं को सुरक्षित नहीं रखा। शनिवार प्रातः 5:47 बजे राष्ट्रपति शासन को अचानक समाप्त करने का नॉटिफिकेशन राष्ट्रपति भवन के तरफ से जारी हुई। राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन लगाते समय भी सुप्रीम कोर्ट और संविधान के मर्यादाओं का उल्लंघन किया। 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने एस आर बोम्मई केस में जो गाइडलाइन दिया,उसका भी राज्यपाल ने उल्लंघन किया।अब तक राज्यपाल द्वारा यह स्पष्ट भी नहीं किया है कि आखिर उनके पास दिए गए समर्थन पत्र में किन-किन सदस्यों ने हस्ताक्षर किए हैं? 91 वें संविधान संशोधन द्वारा दल- बदल अधिनियम के अंतर्गत अब दो तिहाई सदस्य केवल दूसरे दल में विलय कर सकते हैं।ऐसे में अजीत पवार ने जिस तरह भारतीय जनता पार्टी को समर्थन दिया,वह भी संविधान का उल्लंघन है।भारतीय जनता पार्टी ने 170 के अंक का दावा किया है,जो मूलतः जोड़ तोड़ को ही प्रर्दशित करता है।भले ही भाजपा महाराष्ट्र में चुनावी दांव पेंच में आगे हो,लेकिन यह संविधान के मर्यादाओं का उल्लंघन है।अच्छा होता बीजेपी अपने घटक दलों को समुचित सम्मान देती।बीजेपी सत्ता में अहंकारी होती जा रही है,यहीं कारण है कि झारखंड विधानसभा चुनाव में उसने सभी घटक दलों को छोड़ दिया है।
राहुल लाल, संविधान विशेषज्ञ

संविधान गुपचुप तरीके से सरकार बनाने की इजाजत नहीं देता। पहले मुहूर्त तय की जाती है उसके बाद हुकूमत का गठन किया जाता है।
महाराष्ट्र की घटना सियासी नजरिए से बहुत बड़ी है। पूरे मामले में राज्यपाल की भूमिका एक बार फिर ‘हिटमैन’ जैसी साबित हुए है। कुछ सवाल हैं जैसे कि राष्ट्रपति शासन कब हटा? रातोंरात कब दावा पेश किया गया? कब विधायकों की सूची पेश की गई? कब विधायक राज्यपाल के समक्ष पेश हुए? और चोरों की तरह शपथ क्यों दिलाई गई? निश्चित है इसमें कानूनी पहलुओं का ख्याल नहीं रखा गया।

सुभाष कश्यप, संविधान एक्सपर्ट

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