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स्मृतिलोप का प्रकोप !

जीवन में स्मृतियों का बड़ा महत्त्व है | मेरे मित्र नाक, कान और गला विशेषज्ञ हैं । कुछ वर्ष पूर्व एक दुर्घटना में ‘अफेशिया’ का शिकार हो गए थे । चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, मस्तिष्क में यदि तीन मिनट से अधिक खून का संचार अवरुद्ध हो जाए तो मानव मस्तिष्क आंशिक या पूर्ण रूप से निष्क्रिय हो सकता है । इस घटना में उनके साथ ऐसा ही कुछ हुआ, उनका आधा मस्तिष्क निष्क्रिय हो गया । स्मरण शक्ति पर बहुत बुरा असर हुआ । आश्चर्यजनक रूप से उनकी ‘वर्ड-मेमोरी-वेनिश’ हो गई, अर्थात दिमाग से शब्द-स्मृति पूरी तरह समाप्त हो गई । स्कूली शिक्षा से लेकर चिकित्सीय पेशे की सारी पढ़ाई-लिखाई विस्मृत हो गई ! वह बोलने में पूरी तरह सक्षम है किंतु, शब्दों के अभाव में बोल नहीं पाते। आज भी वे, किसी भी भाषा मैं किए गए प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकते क्योंकि उनके पास जवाब देने के लिए शब्द-भण्डार नहीं होता । वर्तमान में हिंदी और अंग्रेजी वर्णमाला सीखने के लिए ट्युटर रखा हुआ है । सच्चाई यह है कि फिर उसी स्तर का ज्ञान और शिक्षा प्राप्त करने के लिए शायद एक जीवन फिर से जीना होगा । स्मृति के अभाव में मित्र का चिकित्सीय पेशा समाप्त हो गया है | खैर, उनका स्मृति-लोप दुर्घटना के कारण हुआ था, किन्तु आज, बिना किसी दुर्घटना के, केवल गलत जीवन शैली से स्मृति-लोप की बीमारी आम होती जा रही है ।

अधुनातन मोबाइल-युग में मानव-स्मृति की उपयोगिता बुरी तरह प्रभावित हुई है । लंबा समय हुआ, जब कैलकुलेटर अस्तित्व में आया और छोटे-मोटे हिसाब-किताब के लिए मानव-मस्तिष्क का स्तेमाल घट गया था | अब तो कैलकुलेटर की सुविधा मोबाइल में भी है | बल्कि किसी व्यक्ति का नाम, पता, ईमेल आई डी या कांटेक्ट नंबर को याद रखने की आवश्यकता नहीं रही | ये सब जानकारी मोबाइल पर एक क्लिक में उपलब्ध हो जातीं हैं | ढेर सारी जानकारियां अब मस्तिष्क-स्मृति में संचित करने की आवश्यकता नहीं है | मानव-मस्तिष्क के घटते उपयोग और प्रयोग से स्मृति-लोप की समस्या दिनोंदिन बढती जा रही है | सच तो यह है कि स्मृति और वास्तविकता में जमीन आसमान का फर्क होता है | स्मृति में बसे चित्र और अवसर सुनहरे पल बनकर सुकून देते हैं | स्मृति में बसीं बचपन की यादें, मकान, रास्ते, आयोजन और अवसर मन को प्रसन्नता से भर देते हैं |

निश्चित ही कैमरायुक्त मोबाइल से गज़ब की क्रान्ति आयी है | जीवन के प्रत्येक अवसर को कैमरे की स्मृति में संजो लिया जाता है | लेकिन ऐसे कितने लोग हैं, जो इन संजोए हुए छाया चित्रों को दोबारा या बार-बार देखते होंगे | मानव स्मृति के साथ सबसे बड़ा घाटा यह हुआ कि मोबाइल में कैद करने के चक्कर में हम सामने घटने वाली घटनाओं, प्रकृति, परिस्थिति या मानवीय संवेदनाओं के साथ पूरी तरह से जुड़ नहीं पाते । लोग इतने निर्दयी होते देखे जाते हैं कि घातक दुर्घटनाओं में भी, दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति की मदद करने की अपेक्षा मोबाइल से फोटोग्राफी करते रहते हैं |

प्रतिदिन प्रातः भ्रमण प्रकृति से जुड़ने का श्रेष्ठ उपाय है क्योंकि प्रकृति हमें ऊर्जा देती है । अनेक लोग प्रातः भ्रमण के लिए जाते भी हैं । किंतु, अधिकतर युवा प्रातः भ्रमण के दौरान कानों में इयर फोन लगाकर गाने सुनते रहते हैं । ऐसे में प्रकृति से पूरी तरह जुड़ने के अभाव में, मिलने वाली ऊर्जा से वंचित रह जाते हैं । वे खूबसूरत लम्हों को आत्मसात नहीं कर पाते | नदिया, जलप्रपात, पहाड़ी की ऊंची चोटिया और जंगल को सेल्फी में कैद करने के चक्कर में कई बार अप्रिय घटनाओं के शिकार हो जाते हैं । कई बार दुर्घटनाओं के मूल में यही एक कारण छुपा होता है । जुड़ाव के अभाव में स्मृतियां सूनी रह जातीं हैं | ऐसा व्यक्ति एकांत में शून्यता महसूस करता है और खिन्नता से मन उब जाता है |

कुछ दिनों से सपरिवार बाहर कहीं घूमने जाने की इच्छा हो रही थी । कोई ऐसी जगह जहां कुदरत का भरपूर नज़ारा हो । लेकिन हर बार यह विचार मज़बूत नहीं हो पाता था । प्रकृति से रूबरू हो पाने की योजना असफल हो जाती थी ! बच्चों और श्रीमती जी का कहना था कि ऐसी जगह घूमने के लिए जाने क्या औचित्य है ? किसी महानगर घूमने जाना चाहिए । प्रकृति, हरियाली, पंछी और जानवर आदि तो मोबाइल, टी.वी० और इंटरनेट पर ही देख लेते हैं । आज इस तरह की सोच ना केवल मेरे जैसे अनेक परिवारों की है बल्कि, लगभग हर युवा में पनप चुकी है ! वे आभासी कुदरत को ही असली कुदरत मान रहे हैं । दिन प्रतिदिन असली प्रकृति का महत्व घटता नज़र आ रहा है ! आम तौर पर शहरी माहौल में रहने वाले बच्चे प्रकृति से कटते जा रहे हैं । वे ना पंछियों का कलरव सुन पाते हैं, ना ही कुत्ते बिल्ली के अलावा कोई और पशु या जानवर को देख पाते हैं ।

एक वैज्ञानिक शोध बताता है कि प्रकृति से दूरी की वजह से शहरों में तनाव बढ़ रहा है । जो सुकून वास्तविक प्रकृति से मिलता है वह आभासी प्रकृति से नहीं मिलता । फिर चाहे वह प्रकृति हम प्लाज्मा टी.वी में ही क्यों ना देखें । आज का कड़वा सच यह है कि वास्तविक कुदरत का अहसास समाप्त हो रहा है । इसे वैज्ञानिक भाषा में ‘एनवायरनमेंटल जनरेशन अमनेसिया’ यानी ‘प्रकृति के प्रति पीढ़ीगत स्मृति लोप’ कहा जाता है । कहीं हम आप भी तो इसके शिकार नहीं हो रहे हैं ?

राकेश सोहम्
एल – 16 , देवयानी काम्प्लेक्स, जय नगर
गढ़ा रोड , जबलपुर [म.प्र ]
फ़ोन : 0761 -2416901 मोब : 08275087650

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