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ताकि न बढ़ें लोकडाउन के बाद मानसिक बीमारियां

विशेषज्ञ : डॉ. राजन जैन, मनोचिकित्सक एवं मनोरोग विभाग प्रमुख, जिंदल इनस्टीटूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च, हिसार 
संकलनकर्त्ता: सुशील कुमार नवीन, वरिष्ठ पत्रकार और लेखक।

■ लोकडाउन मनोदशा पर कर रहा सीधा अटैक।
■ मनोचिकित्सकों के अनुसार लोकडाउन की समाप्ति के बाद अचानक बढ़ सकता है मनोरोगियों का आंकड़ा।
■ अभी से ही इस पर विचार करना जरूरी

वैश्विक महामारी कोरोना ने आज सम्पूर्ण विश्व को प्रभावित किया हुआ है। दिन प्रतिदिन अपना भयावह रूप दिखाने वाली इस बीमारी के चलते लोग अपने ही घर की चारदीवारी में रहने को मजबूर है। यह कब तक चलेगा इस बारे में अभी कुछ कहना नाममुकिन सा है। पर लोकडाउन के अलावा संक्रमण रोकने का कोई और कारगर उपाय भी नहीं है। इसका सीधा असर उनकी मनोदशा पर पड़ रहा है। चिड़चिड़ापन, बैचैनी, घबराहट, नींद न आना आज कॉमन है। इस कंडीशन में यूथ तो अपने आपको किसी अन्य कार्य में व्यस्त कर प्रभावित होने में कामयाब हो जाएगा पर सबसे ज्यादा प्रभावित बच्चे और बुजुर्ग होंगे। मनोचिकित्सकों के अनुसार लोकडाउन के दौर से प्रभावित रोगी सामान्य हालात होने के बाद ही सामने आएंगे। कोई बड़ी बात नहीं है कि ये आंकड़े सामान्य दिनों की अपेक्षाकृत चौकाने वाले हो सकते हैं। भविष्य में ऐसी हालत न बनने पाए इसके लिए अभी से इस पर सोचना और तैयार रहना होगा।
लोकडाउन में मनोचिकित्सकों द्वारा लोगों की मनोदशा में आने वाले बदलाव, उससे होने वाली बीमारियां, लक्षण और संभावित उपचार भी सुझाये जा रहे हैं। देश के प्रमुख चिकित्सा संस्थानों में अग्रणी हिसार के जिंदल इनस्टीटूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च में मनोरोग विभाग प्रमुख डॉ. राजन जैन ने लेखक सुशील कुमार ‘नवीन’ से इस पर विस्तार से चर्चा की।

जिंदल इनस्टीटूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च में मनोरोग विभाग प्रमुख डॉ. राजन जैन

डॉ.राजन जैन के अनुसार एकाकीपन हमेशा मनोरोग में प्रमुख कारण होता है। इस बार इससे विपरीत हैं। अब दूसरे कारण मनोदशा के बिगड़ने का कारण बन रहे है। कोरोना काल के अलग ही तरह के मरीज आएंगे जो इस दौरान अपने सामने आने वाली परेशानियों को साझा करेंगे। मनोचिकित्सकों के सामने रिसर्च का नया विषय बनकर उभरेगा।

दस बड़े कारण जो बढ़ा सकते हैं मानसिक बीमारियां
डॉ. जैन के अनुसार लोकडाउन में सम्भवत: बीमारियां बढ़ने के दस कारण बनेंगे। इन्हीं से आगे और रोगियों के बढ़ने की संभावना है। इन पर अभी ध्यान दिया जाना जरूरी है।

1.संक्रमण का डर।
2. सोशल आइसोलेशन यानि एकाकीपन।
3. इकनॉमिक स्लोडाउन (आय के साधनों पर चिंता)
4. चेंज ऑफ रूटीन।
5.लार्ज स्केल ह्यूमन माईग्रेसन (लोगों का आवागमन)
6. बीमारी से होने वाला फ़ाइनेंशियल बर्डन।
7.जॉब लॉस (नौकरी जाने का डर)।
8 मरीज और परिजनों में सामाजिक बहिष्कार का डर।
9. इलाज की सीमित उपलब्धता। 10 कल क्या होगा की चिंता।

पैनिक अटैक से ग्रस्त होना नुकसानदायक
डॉ.जैन के अनुसार आज के दौर में मानासिक तनाव,घबराहट, बैचैनी, चिंता करना आम है। लोग पैनिक अटैक से ग्रस्त हैं। खांसी आते ही अस्पताल की ओर दौड़ रहे हैं कि कहीं उन्हें कोरोना तो नहीं है। संक्रमण का डर मन में बैठ गया है।घर पर बैठे-बैठे बार-बार हाथ धोने लग जाते हैं। स्वभाव में चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है जो कई और बीमारियों को जन्म दे रहा है।

किसी भी तरह की लत का शिकार होने से बचें
डॉ.राजन जैन ने कहा कि टाइम नहीं गुजर रहा इसका मतलब ये नहीं कि लगातार मोबाइल,टीवी, लैपटॉप, कम्प्यूटर से चिपके रहें। देर तक न सोएं। कोई ऐसी आदत न पालें जो आगे चलकर आपके लिए परेशानी का कारण बनें।

बच्चों और बुजुर्गों पर विशेष ध्यान जरुरी
बच्चे समझ ही नहीं पा रहे हैं कि आखिर ये हो क्या गया है। घरों से बाहर निकल दोस्तों संग खेल नहीं पा रहे हैं। पढ़ें तो कितना पढ़ें। भावनात्मक पहलू शून्यता की ओर है। घर के अन्य सदस्यों के चिंताग्रस्त चेहरे उन्हें और भी परेशान कर रहे हैं। माता-पिता के झगड़े का गुस्सा निकालने का साधन बन रहे हैं। ऑनलाइन पढ़ाई का प्रेशर अलग है।

बच्चों के लिए क्या करे
अभिभावक बच्चों पर अनावश्यक दबाव न बनाएं। रुचियों का ध्यान रखें। इंटरनेट पर पढ़ाई अपनी देखरेख में कराएं ताकि गैरवाजिब मसाला सामग्री से वो दूर रहें। सोने-जागने की रूटीन न बिगड़ने दें। बीमारी से सम्बंधित हर जिज्ञासा का निपटान करें।

बीमार बुजुर्ग और न हो पाए बीमार
डॉ. जैन के अनुसार कोरोना की सबसे ज्यादा मार बुजुर्गों पर पड़ रही है। ऐसे में सबसे ज्यादा खतरा उन पर ही है। आमतौर पर इस उम्र में रक्तचाप(बीपी),शूगर,भूलने की बीमारी तो होती ही है।उस पर कोरोना का डर उनकी इन बीमारियों को और बढ़ा रहा है। दिनचर्या पर पूरा असर है। अपनी उम्र के लोगों के साथ कुछ समय बैठ हंसी ठठे करना बंद है। जो इस उम्र में जरूरी होता है।

बुजुर्गों के लिए क्या करें
रोजाना घूमने जाने वाले बुजुर्गों को अपनी देखरेख में घर की छत पर वाक करने दें। उनके साथ बैठ खुद भी हल्के फुल्के व्यायाम करे और उन्हें भी करवाएं। उनके साथ टाइम स्पेंड करें। खाने पीने पर विशेष ध्यान दें। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने के दौरान उन्हें फोन के माध्यम से अपनों से टच में रखें।

यूथ को सम्भालनी होगी ज्यादा जिम्मेदारी
इस माहौल में यूथ पर वक्त को संभालने की ज्यादा जिम्मेदारी है। बच्चे नासमझ हैं। बुजुर्ग अपने एक अलग पड़ाव पर हैं। एक हिसाब से वो भी बालपन का जीवन जी रहे हैं। दोनों ही वर्ग इस समय निर्णय लेने की क्षमता से दूर हैं। ऐसे में यूथ को खुद को तो इससे बचाना है ही इसके अलावा घर के बुजुर्ग और बच्चों का भी केयर टेकर का रूप धारण करना है। युवा इस समय हर तरह के नशे से बचे। यूएस बेस हेल्थकेयर सिग्मा के रिसर्च में सामने आया है कि अकेलेपन का मृत्यु दर पर उतना ही प्रभाव है जितना 15 सिगरेट पीने पर होता है। ऐसे में खुद को घर के हर सदस्य के साथ बिजी रखें। इंटरनेट जरूरी हो तो ही प्रयोग करें।

लोकडाउन में क्या करें क्या न करें
डॉ. राजन जैन के अनुसार एक हद तक उदास होना, चिंतित होना,घबराहट सामान्य है। इस पर एकदम से भागादौड़ी करना उचित नहीं है। दिनभर कोरोना सम्बन्धी अपडेट पर नजर न रखें। बढ़ते आंकड़ों को देखते रहना भी तनाव बढ़ाता है। सोशल मीडिया पर बिना फैक्ट्स जाने विश्वास न करें। लाइफ स्टाइल,रूटीन चेंज न करें। दिनभर बिस्तर पर न पड़े रहें। मुसीबत से लड़ने की अपनी ताकत को पहचान रिचार्ज करते रहें। खुद को प्रोटेक्ट करें और दूसरों के केयर टेकर बनें। जो ठीक हुए हैं उनकी कहानियां पढ़ें कि कैसे उन्होंने ये जंग जीती। जो लोग मदद करें है।

संकलनकर्त्ता: सुशील कुमार नवीन, वरिष्ठ पत्रकार और लेखक।

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