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कवि प्रदीप के जन्म दिवस पर विशेष : भारत माता के मंदिर का दीप ‘प्रदीप’

थी खून से लथ-पथ काया, फिर भी बन्दूक उठाके
दस-दस को एक ने मारा, फिर गिर गये होश गँवा के
जब अन्त-समय आया तो, कह गए के अब मरते हैं
खुश रहना देश के प्यारों, अब हम तो सफ़र करते हैं

लता मंगेशकर के द्वारा गाए और भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर देश के बच्चे-बच्चे तक की आंखों को नम करने वाले ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ गीत की इन पंक्तियों में एक ऐसी आत्मा की आवाज गूंजती है जो आजीवन भारत माता के मंदिर में दीप के भांति प्रदीप बनकर अपने प्रकाश से देशभक्ति का ऐसा वातावरण बनाया जिसे भारतीय आजीवन स्मरण करेंगे। जी हां मैं भारत के प्रसिद्ध गीतकार कवि प्रदीप की बात कर रहा हूं। कवि प्रदीप का असली नाम रामचंद्र नारायण जी द्विवेदी था। इनका जन्म 6 फरवरी सन 1915 में मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले के बड़नगर में हुआ था। लगभग 5 दशकों तक 71 फिल्मों के लिए 1700 गीत लिखकर जो कीर्तिमान बनाया है वह हिंदी साहित्य के क्षेत्र में किसी वटवृक्ष से कम नहीं है। मैं प्रदीप के गीतों को वटवृक्ष इसलिए कहता हूं क्योंकि इन गीतों की शाखाओं से देशभक्ति की जड़े निकलती है जो भारत मां की पावन धरती में धंसकर असंख्य देशभक्ति पूर्ण कविता लिखने वाले कवियों को जन्म दिया, देती है और आगे भी देती रहेंगी।
दादासाहेब फालके और और संगीत नाटक अकादमी के पुरस्कारों से सम्मानित कवि प्रदीप का जीवन देशभक्ति के रंग से सराबोर है। सन 1940 में बंधन फिल्म के साथ अपने गीतकार जीवन का आरंभ करने वाले कवि प्रदीप ने ‘चल चल रे नौजवान’, ‘आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की’, ‘दे दी हमें आजादी खड्ग बिना ढाल साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल’, ‘यहां वहां जहां तहां मत पूछो कहां कहां’ जैसे गीतों में अपने अमृत स्वर से देशवासियों के हृदयों में विशेष स्थान बनाया है।
भारत की पृष्ठभूमि में धार्मिक मतभेदों के चलते होने वाले झगड़ों के बारे में कवि प्रदीप बहुत पहले ही भाग गए थे। उनका मानना था कि धार्मिक कलह के कारण देश के टुकड़े हो सकते हैं। इसलिए धार्मिक ककह की जगह धार्मिक एकता को उन्होंने महत्व दिया। उन्होंने सभी धर्मों के निचोड़ को मानवता के रूप में देखा और उसी मानवता को अपने गीत के माध्यम से आजीवन प्रस्तुत करने का जो प्रयास किया है उसके लिए हमें नतमस्तक होकर उन्हें प्रणाम करना चाहिए। ‘न हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा’ गीत की पंक्तियों में उनके दूरदृष्टा, दार्शनिक तथा मानवता के पुजारी होने का प्रमाण मिलता है –

मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया, हमने उसे हिन्दू या मुसलमान बनाया
कुदरत ने तो बख्शी थी हमें एक ही धरती, हमने कहीं भारत कहीं इरान बनाया
जो तोड़ दे हर बंध वो तूफ़ान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा।
नफरत जो सिखाये वो धरम तेरा नहीं है, इन्सां को जो रौंदे वो कदम तेरा नहीं है
कुरआन न हो जिसमे वो मंदिर नहीं तेरा, गीता न हो जिसमे वो हरम तेरा नहीं है
तू अम्न का और सुलह का अरमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा।।

कवि प्रदीप के गीतों में देश की भलाई करने वाले हर दिखाई देते हैं। दूर हटो ए दुनिया वालो ‘हिंदुस्तान हमारा है’ गीत के माध्यम से भारत की शक्ति, स्वार्थी मनुष्य के बदलते रंग को दर्शाने वाला गीत ‘कितना बदल गया इंसान’, ‘अहिंसा की पूजा करने वाले महात्मा गांधी को संबोधित करने वाला गीत ‘साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल’, भारत की महानता और उसकी विशेषता को दर्शाने वाला गीत ‘आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की’ तथा आने वाले दिनों में भारत की युवा पीढ़ी को संबोधित करने वाला गीत ‘नई उम्र की कलियों तुमको देख रही दुनिया सारी’ जैसे गीतों के माध्यम से अपनी प्रतिभा की विविधता का को परिचय है, वह चित्र स्मरणीय है। नवगीत कार से लेकर महान गीतकार बनने तक के लिए वे आदर्श प्राय है।
कवि प्रदीप देशभक्ति रचनाओं के लिए जाने जाते हैं, किंतु उनके गीतों का एक दूसरा रंग भी है जो की भक्ति के रंग से ओतप्रोत है। आज भी आप किसी मंदिर चले जाइए तो प्रदीप के गीत बरबस सुनने को मिल जाते हैं। जय संतोषी मां फिल्म के लिए लिखे उनके अमर गीत ‘मैं तो आरती उतारू रे जय जय संतोषी माता जय जय जय’ तथा ‘यहां वहां जहां तहां मत पूछो कहां कहां है संतोषी मां’ आज भी हमारे कानों में गूंजते हैं। कवि प्रदीप ने जिस रस को भी चाहे वह वीर रस हो या भक्ति रस, सभी में उन्होंने अपना लोहा मनवाया। उनका काव्य हिंदी साहित्य में उपयुक्त स्थान प्राप्त करने योग्य है। इनके गीतों में उपमा, रूपक, बिंब का सुंदर प्रयोग मिलता है। यदि कोई साहित्यकार इनकी रचनाओं का अध्ययन करता है तो उसके लिए किसी खजाने से कम नहीं है। कवि प्रदीप के गीतों में सौंदर्य अनुभूति कूट-कूट कर भरी हुई है। शब्द चयन के जादूगर थे। उनका कोई सानी नहीं है।
11 दिसंबर, सन 1998 में इस दुनिया को अलविदा कहने वाले कवि प्रदीप ने हमें जीवन में ऐसी कई सीख दी है जिसका आजीवन पालन करना चाहिए। आज के माता-पिता को चाहिए कि इन गीतों के माध्यम से अपने बच्चों में नैतिक गुणों का पर्याप्त विकास करें। उन्हें बताएं कि क्या अच्छा है और क्या बुरा। ऐसा करने पर यदि हम सफल हो पाते हैं तो कवि प्रदीप के जन्म दिवस के अवसर पर हम उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दे सकते हैं। कवि ‘उरतृप्त’ के शब्दों में कहा जाए तो-

देह बुझा है दीप नहीं, तू जलता रहेगा कवि प्रदीप।
जग रोशन है प्रकाश तेरे, नहीं बुझेगा कवि प्रदीप।।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार
चरवाणीः 73 8657 8657, Email: [email protected]
https://hi.wikipedia.org/s/glu8

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