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मेरी अभिव्यक्ति

मानव जीवन संघर्षों की कहानी है, जिसमें प्रकृति की अहम भूमिका होती है। यह कोरोना काल मानव के कृत्यों के फलस्वरूप प्रकृति का प्रकोप है।
प्रत्येक काल की अपनी विशेषता होती है, अतः इस काल में भी गुण – दोष, आशा – निराशा सब कुछ समाहित है। मानव आधुनिकता में उलझकर अपने परिवार को भी भूलने लगा था। रिश्ते बिखर रहे थे। उसे परिवार का सान्निध्य मिला। मानवता की भावना बढ़ी। गाँव और माता – पिता याद आए, परंतु कष्ट भी कम नहीं रहा। असंख्य लोग बेरोजगार हो गए। भोजन के भी लाले पड़े।आश्वासन मिला, पर आश्वासन ही रह गया।

निम्न पंक्तियाँ मानव के दर्द को उजागर कर रहीं हैं —

नैन – दीप जलता रहा, कर नैराश्य विनष्ट।
उम्मीदों की चाल ने, दिया बहुत ही कष्ट।।

श्रम ही तो आधार था, उससे हुए विपन्न।
रहा न अब पानी कहीं, नहीं बचा है अन्न।।

सब आशाएँ त्याग के, पकड़े घर की राह।
अपना चौखट देख लें, बस इतनी है चाह।।

छोटे बच्चों का यह दुख भरा प्रश्न कितना हृदय स्पर्शी है —

चलते – चलते थक गए, छोटे – छोटे पाँव।
पूछें वे माँ – बाप से, कहाँ हमारा गाँव ??

परंतु मानव तो मानव है। कष्टों को झेलना और उससे लड़ना उसे आता है। वह हिम्मत करके आगे बढ़ रहा है, शायद यह कहते हुए —

दुश्मन – सा आया कोरोना,
भयाक्रांत भू का हर कोना।
पर इससे भयभीत न होना,
धैर्य और साहस मत खोना!

मौत भला कब तक नाचेगी,
बैठ भाग्य कितना बाँचेगी?
नियति सर्वदा भू को सींचे,
किंतु अभी है आँखें मीचे।

भाग्य धरा का भी जागेगा,
निश्चय ही ये अरि भागेगा।
अपनी रक्षा स्वयं करेंगे,
सच मानो हम जयी बनेंगे।

यह संदेश है मानव के लिए, मानवता के लिए। निश्चित रूप से कोरोना भागेगा। मानव विजयी होगा, क्योंकि उसके पास धैर्य, हिम्मत, आशा, विश्वास, आस्था और श्रम की शक्ति है।

डाॅ० अतिराज सिंह

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