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कहानी: आखिर सानू स्कूल कब से जायेगी, कब खुलेगा उसका स्कूल…..

सानू अलसुबह चौंक कर नींद से जागी और बिस्तर पर बैठकर रोने लगी। सिसकियाँ गूंजने लगी। रोने का उसका यह क्रम चलता देख उसकी माँ ने उसे पुचकारते हुए पूछा- वह क्यों रो रही है। सानू ने रोते हुए कहा कि माँ मैंने एक बुरा सपना देखा। यह कहकर वह फिर से रोने लगी थी। उसकी माँ घबरा गई थी। उसने नन्ही बालिका से फिर दोहराया कि वह किस कारण रो रही है, वह सपना कैसा था। सानू ने अपनी माँ से कहा- माँ मत पूछो। वह सपना बड़ा भयानक था। आखिर कुछ तो बताओ, पहले चुप हो जाओ, फिर सपने के बारे मे बताओ। अपनी माँ की बात सुनकर सानू चुप हो जाती है, फिर कहती है कि उसने देखा कि स्कूल खुल गया है, और स्कूल जाने के लिए तुम मुझे तैयार कर रही हो। सानू का वह सपना जिसे उसने अब से 3 माह पूर्व देखा था, अभी तक पूरा नहीं हुआ है। उसकी मम्मी को यह उम्मीद है कि भारत के स्वतन्त्रता दिवस 15 अगस्त अवसर पर सानू स्कूल में आयोजित कार्यक्रम में अवश्य ही भाग लेगी।
काश! ऐसा ही हो। वह विद्यालय में पढ़ाया गया सब कुछ भूल चुकी है। उसका स्कूल जाने का मन नही होता। इस समय वह अपने हमजोलियों के साथ घर के अन्दर ही खेलती है। मन पसन्द खाना खाती है…..आदि…….आदि………आदि। अभी तक उसका स्कूल खुला ही नहीं। ऑनलाइन पढ़ाई करके अन्य बड़े बच्चे स्कूलों की फीस भरने को बाध्य किये जा रहे हैं। मार्च से लेकर जुलाई भी अपने समापन की तरफ है। सरकार के निर्णय की प्रतीक्षा में आम लोग। राजकीय सेवाओं के ओहदेदार वर्क फ्राम होम कर रहे हैं। बड़े व उच्च पदस्थ अधिकारी गण पी.पी.ई. किट पहनकर क्षेत्रों का भ्रमण कर रहे हैं। मीडिया में खबरें छपती हैं, और यह क्रम जारी है। कोरोना वायरस का कहर कब समाप्त होगा……….? इससे बचने की वैक्सीन कब तैयार होगी? इसी पर चर्चाएँ हो रही हैं। विपक्षी दलों के पक्षधर सत्तारूढ़ पार्टियों और सरकारों को कोस रहे हैं।
समाज सेवी संगठनों के एक्टिविस्ट समाज सेवा करने की औपचारिकता पूरी कर रहे हैं। पहले मास्क, सैनिटाइजर और कतिपय स्थानो पर राशन बटवाया। अब चुनिन्दा जगहों पर सैनिटाइजेशन कर रहे हैं। जैसे-जैसे समय बीत रहा है अब फ्री में मिलने वाला भोजन भी मिलना बन्द हो गया है। यानि कम्यूनिटी किचेन बन्द कर दिये गये हैं। पुलिस की पौ-बारह है। मास्क चेकिंग के नाम पर वसूली जारी है। न दे पाने वाले जुर्माना भर रहे हैं। गोया आम आदमी से बड़ा अपराधी कोई नहीं है। हमने पी.एम. के कहने पर थाली बजाई। बत्ती गुल कर मोमबत्ती जलाया। सब कुछ ठीक उसी तरह किया जैसे रिमोट चाहित रोबोट। अब तो पी.एम. का निर्देश और उनके मन की बात का श्रवण किये महीनों बीत रहे हैं। पहले लॉकडाउन चला अब अनलॉक के बीच दो दिवसीय साप्ताहिक लॉकडाउन चल रहा है। इस स्थिति में मानव रहने को विवश जैसे उसकी जिन्दगी ही थम गई हो। सड़कों पर सन्नाटा। रेल पटरियाँ सूनी। कब चलेंगी मोटर बसें और रेल गाड़ियाँ। अटकलों का बाजार गर्म। पहले महामारी से जान बचाओ, मास्क पहनो, हाथ धुलो और लोगों से दूरियाँ बढ़ाओं यानि मास्क, सेनिटाइजर और सोशल डिस्टैन्सिंग शुड भी मेनटेन्ड, बी सेफ, बी हेल्दी। कोविड-19 पर तरह-तरह की टिप्पणियाँ और लोगों के विचार जारी। बीच-बीच में नामचीन चुनिन्दा सेलीब्रिटीज की मौतें खास हित-मित्रों की कोरोना की चपेट में आने से हुई मौत काफी दुःखदायी रही।
कोरोना काल में हमें बहुत कुछ जानने का अवसर मिला। मसलन- पैन्डेमिक (वैश्विक महामारी) कोविड-19, लॉकडाउन, अनलॉक, मास्क, सैनिटाइजर और सोशल डिस्टैन्सिंग जैसे शब्दों की जानकारी हुई। लॉकडाउन में थर्मल स्क्रीनिंग, कोरेन्टाइन, आइसोलेशन, कोविड अस्पताल-एल 1, एल 2, एल 3, कन्टेनमेन्ट जोन आदि की विशेष रूप से जानकारी हुई। इस अवधि में सड़क मार्ग पर यातायात लगभग ठप्प रहा। परन्तु देश के कोने-कोने से माइग्रेन्ट लेबर्स को ढोने वाली स्पेशल सुपरफास्ट ट्रेनें देखने को मिलीं। लॉकडाउन के शुरूआती दिन में ही हमने वैश्विक महामारी की जंग लड़ने के लिए थाली, लोटा, घण्टा-घड़ियाल बजाने के साथ-साथ विद्युत चालित उपकरणों को बन्द कर अपने-अपने घरों में अंधेरा कर मोमबत्तियाँ जलाईं। हमने देखा कि अनेकों संगठनों ने लॉकडाउन अवधि (कम से कम तीन माह) की विद्यालयी फीस माफ किये जाने के लिए आन्दोलन किया, परन्तु नतीजा सिफर ही रहा। प्रदेश और केन्द्र की सरकारों ने आर्थिक तंगी झेल रहे अभिभावकों की इस समस्या का हल नहीं निकाला। यदि यह कहा जाये कि सरकार ने विद्यालयी प्रबन्धन और अभिभावकों को अपने हाँ और न जैसे निर्णय के बीच उलझा कर रखा। इसके अलावा गरीब और मध्यम वर्गीय अवाम के घरों के पंखा और बत्ती जैसे विद्युत कनेक्शन के बिलों की माफी को कौन कहे, बकाया देय बिलों पर भी सरकार ने विचार नहीं किया। केन्द्र सरकार ने मार्च महीने के अन्त और अप्रैल के प्रथम सप्ताह तक गरीबों के बैंक खातों में 500 रूपए प्रति खाता धारक को आर्थिक इमदाद के रूप में दिया। उसके बाद साइलेन्ट। पी.एम. ने अपने मन की बात में स्पष्ट किया कि कोरोना वायरस लड़ाई काफी लम्बी है। आत्म निर्भर बनकर दृढ़ इच्छाशक्ति से इसका डटकर मुकाबला करें। मास्क के स्थान पर प्रायः इस्तेमाल होने वाला लम्बा गमछा, लम्बी रूमाल, स्ट्रॉल, दुपट्टा इस्तेमाल करें। साबुन पानी से अपने हाथों को बराबर धोते रहे। सामाजिक दूरी बनाये रखें….आदि…..आदि…..आदि। हमने कोरोना काल में प्राण बचाने के लिए पी.एम. की हर बात मानी, और मान रहे हैं। थाली बजाया………घरों में अंधेरा कर मोमबत्तियाँ जलाई। मास्क पहन रहे हैं। सैनिटाइजर का इस्तेमाल करते हुए सोशल डिस्टैन्सिंग मेनटेन रख रहे हैं। कुल मिलाकर बीते 4 महीनों में जिन्दगी थम सी गई है। सानू और उसके हमउम्र बच्चे भी सब कुछ भूल चुके हैं। स्कूल विद्यालय क्या होते हैं यह जानने के लिए उन्हें फिर से माइन्ड मेकअप करना पड़ेगा। बहरहाल कुछ भी हो, वैश्विक महामारी कोविड-19 और पूरे विश्व की मेडिकल साइंस को लकवा सा मार गया है। इस कथित जानलेवा वायरस का एन्टीडोज कब तक सर्वसाधारण के लिए उपलब्ध होगा, कहना मुश्किल है। देश में लोगों की थमी हुई जिन्दगी कब सुचारू होगी? बसें और ट्रेने तथा अन्य साधन कब फिर से पूर्व की भाँति यानि 25 मार्च 2020 के पहले की तरह कब चलेंगे।
सानू 6 वर्षीय नन्हीं बच्ची है। यू.के.जी. उत्तीर्ण कर गई है। यदि सब कुछ सामान्य होता तो अब तक वह क्लास 1 में पढ़ाई कर रही होती। अपने स्कूल को पूर्व की भाँति यूनिफार्म पहनकर, कॉपी-किताब से भरे बैग, हाथ में टिफिन और पानी की बोतल लिये मम्मी को बाय बोलते हुए जाती।
परन्तु वाह रे कोरोना……..पैन्डेमिक कोविड-19 तुम कितने महान हो इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चाँद और मंगल तथा अन्य ग्रहों पर आसानी से पहुँचने वाला इंसान तुम्हारे आगे नगण्य सा होकर रह गया है। उसका सारा विज्ञान फेल हो चुका है। फिर भी हम आस लगाये बैठे हैं कि आने वाले दिनों में शीघ्र ही मानव तुमसे जंग में जीतने के लिए आवश्यक दवाइयाँ ईजाद कर लेगा।

रीता विश्वकर्मा

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