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सशक्त महिला सशक्त समाज

महिलाएं आज हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चल रही है। चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो या व्यापार का अथवा देश को चलाने की बात हो या फिर घर को संभालने की महिलाएं कहीं पीछे नहीं है। यहां तक कि देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी वे बखूबी निभा रही हैं। महिलाओं ने हर जिम्मेदारी को पूरी जिम्मेदारी और निष्ठा से निभाया है। आज नारी जाग्रत एवं सक्रिय हो गयी है वह अपने अंदर निहित शक्तियों को जानने लगी है, जिससे आधुनिक नारी का समाज में न केवल सम्मान अपितु प्रतिष्ठा भी बढ़ी है। व्यवसाय एवं व्यापार जैसे पुरुष एकाधिकार वाले क्षेत्र में जिस प्रकार महिलाओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है वो काबिले तारीफ है। इस परिपेछ्य में इंदिरा नूई, चित्रा रामाकृष्णन, अनीता कपूर, अरुंधति भट्टाचार्या, आशु सुयश आदि के नाम प्रसिद्ध हैं।
प्राचीनकाल में नारी की शक्ति की पहचान अपाला, घोषा और अनुसुइया जैसी विदुषी महिलाओं से होती थी। ये सभी सिर्फ अपने ज्ञान के चलते ऋषिकाओ के नाम से जानी गयी। रानी लक्ष्मीबाई की वीरता के बारे में कौन नहीं जानता जिसने सिर्फ अपने साहस के बल पर अंग्रेजो के दांत खट्टे कर दिए। नारी उस वृक्ष की भांति है जो विषम परिस्थितियों में भी तटस्थ रहते हुए राहगीरों को छाया प्रदान करती है। नारी की कोमलता एवं सहनशीलता को कई बार पुरुषों ने उसकी निर्बलता मान लिया और इसलिए उसे अबला कहा किन्तु वो अबला नहीं है वो तो सबला है। पुरुष वर्ग शायद ये नहीं जानते की उसकी इसी कोमलता एवं सहनशीलता में ही मानव जीवन का अस्तित्व संभव है। क्या माँ के सिवाय संसार में ऐसी कोई हस्ती है जो उसी वात्सल्य और प्रेम से शिशु का लानन-पालन कर सके जैसे की माँ करती है। संसार में चेतना के अविर्भाव का श्रेय नारी को ही जाता है, इस में किंचित मात्रा भी संदेह नहीं है कि नारी ही वो शक्ति है जो समाज का पोषण से लेकर संवर्धन तक करती है।
आजादी से पूर्व हमारा देश अनेक रूढ़ियों से ग्रसित था। बेटी को कोख में मारने, सती प्रथा जैसी कुप्रथा समाज में प्रचलित थी। नारी को पढ़ाना तक पाप समझा जाता था। नारी घूंघट में रहे, ऐसा हमारा सोचना और विचारना था। अंग्रेजों के आने के बाद हालांकि नारी स्वतंत्रता और समानता की बातें सुनने और पढ़ने को मिली। धीरे-धीरे समाज और वातावरण में आये बदलाव ने महिला स्वतंत्रता को समझा और उनके अधिकारों और कत्र्तव्यों की बातें होने लगी। नारी को चूल्हे-चैकी से बाहर लाया गया। इस दौरान शिक्षा के विस्तार ने क्रांतिकारी बदलाव का मार्ग अख्तियार किया और शिक्षा रूपी ज्ञान की रोशनी से हमारा समाज जगमगाया। हमने महिला शिक्षा की अहमियत समझी और उन तक शिक्षा की ज्योति को पहुंचाया। आज के दौर में स्त्री किसी भी रूप में पुरुषो से कम नहीं है, वो हर चुनौती का बड़ी ढृढ़ता से सामना कर रही है।
इन पंक्तियों द्वारा कहना चाहूंगी, जिसे मैंने समस्त नारी सत्ता को समर्पित किया है, वो इस प्रकार है –
ये शक्ति स्वरूपा नारी है, ये शक्ति स्वरूपा नारी है,
ये दुर्गा है, ये काली है, ये शक्ति स्वरूपा नारी है।
ये माँ भी है, और बेटी भी, ये झाँसी की मर्दानी है
ये शक्ति स्वरूपा नारी है, ये शक्ति स्वरूपा नारी है।
जीवन का किया सृजन इसने, है मौत भी इससे हारी है
ये शक्ति स्वरूपा नारी है, ये शक्ति स्वरूपा नारी है।
करती संघर्ष प्रत्येक दिवस, ना हार मानने वाली है
ये शक्ति स्वरूपा नारी है।

राखी शुक्ला
अध्यक्ष ,वुमन पावर सोसाइटी राजस्थान , जयपुर।

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