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सुरेश सौरभ की दो लघुकथाएं

किस्मत


लॉकडाउन के चलते सारी दुकानें बंद चल रहीं थीं। उस थाने के पुलिस वालों को बहुत दिनों से जब मीट खाने को नहीं मिला, तब वह मीट खाने की तलब में मन ही मन ईश्वर से की दुआ करने लगे।
जब लॉकडाउन में मीट की दुकानें न खुलीं, तो उस मोहल्ले के कुछ लोगों ने चुपके से चिकवा बुलाकर मोहल्ले में ही एक बकरा कटवा दिया। तब किसी से सूचना पाकर फौरन उस थाने की पुलिस वहां पहुंच गई। पुलिस देख फौरन बकरा कटाने वाले चिकवा समेत सभी भाग खड़े हुए। पुलिस कटे हुए बकरे को अपने साथ ले गई। उनकी हार्दिक इच्छा पूरी हुई। ईश्वर को धन्यवाद दिया। उधर मीट न पाने वाले मोेहल्लेवासी अपनी चुलबुली जीभों को समझाते हुए अपनी किस्मत को कोस रहे थे और पुलिस वालों को घिनी-घिनी गालियों से नवाज रहे थे।

उम्मीदों की छूटी रेल


सरसराती मेरी उम्मीदों की, आशाओं की रेल बेतहाशा भागी जा रही थी और उससे भी तेज मेरी हसरतों के अनगिन पंक्षी ऊंचे गगन में परवाज भरते जा रहे थे। निश्चित समय पर स्टेशन पहुंच गया मैं। फिर तांगा करके अपने गांव पहुंचा। घर के दरवाजे पर पहुंचते ही मेरी सात साल की बेटी दौड़ कर मुझसे लिपट गई। पापा पापा पापा… बरसों बाद मुम्बई से लौटा, इसलिए मेरी यह लाडली जैसे एक दिन में ही सारा प्यार मुझ से पा लेना चाहती थी। पत्नी ने देखा, तो थोड़ा मुंह बिगाड़ कर अंदर चलीं गई, मानो कहना चाह रहीं हो, बड़े निर्दयी हो, एक अबला को बरसों तरसाते तरस नहीं आता, जाओ! तुमसे कुट्टी, पर मजबूरियां इंसान को इंसान से जुदा करतीं हैं। या यूं भी कह सकतें है, इस पापी पेट के लिए हमें जुदा करतीं हैं। कहना तो, वह बहुत कुछ चाहेगी पर सब जब्त करके मेरा ही हाल पूछेगी और अपनी कुछ भी व्यथा-कथा न बतायेगी।
आज बरसों बाद उसके हाथों का खाना खाकर जैसे स्वर्गीय सुख मिला हो। अभूतपूर्व आनंद की त्रिवेणी का जैसे तट मिल गया हो।
तभी धडाक.. धड़ाक मेरे पीछे दो लाठियां किसी ने जमा दीं।.अरे..दादा!… साले जब पता है ट्रेन नहीें जायेगी, तो फिर क्यों यहां फालतू में पड़ा सो रहा है।
’साहब गरीब आदमी हूं। मजूर हूं। कई दिन से दिन-रात भूखा-प्यासा भटक रहा हूं। जरा सा लेटा ही था कि आंख लग गई और देखा।’
’साले दिन में सपने देखता है। क्या देखा बे!’
‘बेटी, बीवी और रोटी।’
’साले जल्दी यहां से भाग जा, गाड़ी-वाड़ी कुछ नहीं चलेगी। हां तुझ पर डंडे और चल जायेंगे। सरकार ने लॉकलाडन में सब बंद कर रखा है। फिर भी साले यहां मरने चले आए।
’तब मैं कैसे घर जाऊं।’
‘अबे! भाग बिहारी, जा रहा है या पहुचाऊं तुझे तेरे घर फौरन। यह कहकर उस पुलिस वाले ने दोबारा मारने के लिए बड़ी तेजी से अपनी लाठी उठाई।
‘हुजुर ,हुजुर जाता हूं। खुदा के लिए न मारे।‘
‘जा रहा है या दूं दो-तीन खींच-खींच।’
डरते-हांफते-कांपते हुए पैदल ही अपने गांव की ओर चल पड़ा मैं। मेरे साथ मेरे जैसे तमाम दिहाड़ी मजदूरों का रेला चल पड़ा। यह रेला सैंकड़ों किलो मीटर दूर कब तक अपने-अपने गांवों-घरों में पहुंचेगा यह किसी को न मालूम था। मजूर का न कोई भूत, न कोई भविष्य होता है और न उसका कोई ईश्वर होता है, अगर होता तो सदा मजदूरों शोषण न होता। हम तो बस अपने गांव-घर की एक झलक पाने के लिए भूखे-प्यासे बेतहाशा भागे जा रहे थे, मरेंगेे तो, अपने करम से जियेंगे, तो अपनेे करम से। अब बस मेरे गांव की मिट्टी मुझे बुला रही है और कौन मिट्टी मुझे मिलेगी, यह नहीं मालूम।

सुरेश सौरभ
निर्मल नगर लखीमपुर खीरी उत्तर प्रदेश पिन-262701
मो-7376236066

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