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सिस्टम की सासें

वह अपने पति के गले से लग कर बड़े प्यार से बोली-हर सांस तुम्हारी है प्रियतम, उसका पति भी आत्मीयता से बोला-मेरी भी हर सांस तुम्हारी प्रिये! सुहागरात की, प्रथम मिलन की, बेला में पति-पत्नी ने ऐसी अनेक कोमल भावनाएं एक-दूसरे में रोपित कीं।
बरसों बाद एक महामारी आई। एक रोज उसके पति को सांस लेने में बेहद तकलीफ होने लगी। वह अपने पति को लेकर अस्पताल की ओर दौड़ी। रास्ते में जब पति की सांसें टूटने लगीं, तो उसने कई बार, अपने मुंह से, अपने पति के मुंह में सांस देने की जुस्तजू की। छटपटाते-तड़पते पति को कुछ राहत मिली। अस्पताल पहुंचते ही उसने अपने पति को भर्ती करने के लिए बार-बार डाक्टरों से मिन्नतें कीं, पर डाक्टरों ने कहा-यहां सांस की समस्या से पीड़ित मरीजों के लिए पहले से ही आक्सीजन नहीं है, बेड नहीं है। यहां से ले जाएं। हम विवश हैं, आप के लिए कुछ नहीं कर सकते। वह डाक्टरों से बराबर प्रार्थना करती रही। छटपटाते पति को बार-बार अपने मुंह से सांस देती रही, पर देखते ही देखते उसके पति की सांसें टूट गईं। अब पत्नी फूट-फूट कर रोने लगी और कहने लगी-मेरे पति को डाक्टरों ने मार डाला। हाय! मेरे पति को इस अस्पताल ने मार डाला।” अब वहां तमाशा देखने वाले खुसुर-पुसुर कर रहे थे। एक बोला-जब सरकार ही टूटती सांसों का इंतजाम नहीं कर पा रही है, तो बेचारे डाक्टर क्या करें। दूसरा बोला-हर सांस पर ऊपर वाले का नाम लिखा है। जब तक वह चाहे तब तक चलती है। तीसरा-यहां जब नीचे वाले ही गरीबों का सांस लेना दूभर करें हैं, तो ऊपर वाला बेचारा क्या करे। चौथा-यहां गरीबों सांसों का कोई मोल नहीं। अगर अपनी सांसें बचानी हैं, तो खुद अपना आक्सीजन सिलेन्डर लेकर आओ, दवाएं लेकर आओ। अब अखबार कह रहे थे-सरकार की बदइंतजामी के कारण गरीबों की टूटती-बिखरती सांसों का कोई पुरसाहाल नहीं।

 

सुरेश सौरभ

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