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Tag: Dr. Ajay Khemaria

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क्रोनी कैपिटलिज्म, मीडिया ट्रायल, औऱ बाजार के बीच कोरोना

हमारे लोकजीवन की चेतना, ऊर्जा,औऱ संकेन्द्रण मीडिया ट्रायल पर अबलंबित हो गए है।सूचना क्रांति ने सूचना की सीमित महत्ता को अनावश्यक व्यापक और विशाल बना दिया है। केवल निजी तौर

सिंधिया ने मप्र में अपने पिता का बदला पूरा किया

राजनीति औऱ प्रबन्धन शास्त्र के अंतर को रेखांकित करता है सिंधिया का बीजेपी में जाना   जो हिम्मत स्व.माधवराव सिंधिया अपने विराट राजनीतिक प्रभाव के बाबजूद नही दिखा पाए उसे उनके

निजी मेडिकल कॉलेज :कारपोरेट, कालेधन और अफसरशाही का समुच्चय

प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की देश के स्वास्थ्य क्षेत्र में क्या भूमिका है?इस सवाल के अक्स में केवल कारपोरेट पूंजी औऱ उससे उपजी संपन्न चिकित्सकीय बिरादरी ही नजर आती है।हाल ही

मप्र में कांग्रेस की घरेलू कलह से हिली सरकार

मप्र में कमलनाथ सरकार पर छाया संकट असल में पार्टी आलाकमान की कमजोरी और मंत्रिमंडल चयन में बरती गई अपरिपक्वता का नतीजा है। 230 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए

क्या इंदिरा के अक्स से भी डरने लगी है कांग्रेस ..!

मप्र के मुख्यमंत्री कमलनाथ का एक परिचय संजय गांधी के परम मित्र औऱ इंदिरा गांधी के तीसरे बेटे वाला भी है।वही संजय गांधी जिन्होंने दिल्ली के तुर्कमान गेट पर अतिक्रमण

आखिर क्यों दिवालिया हो रहे है डिस्काम..?

देश भर में पिछले 17 बर्षों से बिजली घोटाला हो रहा है। करीब 10 लाख करोड़ का सरकारी घाटा औऱ इतनी राशि की बंदरबांट मौजूदा विधुत अधिनियम 2003 के क्रियान्वयन

कलेक्टर : नाम नही मन बदलने की दरकार

मप्र में सरकार कलेक्टर का नाम बदलने जा रही है।अंग्रेजी हुकूमत के लिए राजस्व वसूलने यानी कलेक्ट करने के लिए ईजाद किये गए कलेक्टर के पद में अभी भी औपनिवेशिक

मप्र में क्यों सड़क पर उतरना चाहते है सिंधिया..!

मप्र के उत्तरी औऱ मालवा इलाके में सोशल मीडिया पर एक नारा ट्रेंड कर रहा है “माफ करो कमलनाथ … हमारे नेता तो महाराज”। कमलनाथ के दिल्ली आवास पर ज्योतिरादित्य

दीनदयाल जी के अक्स में दिल्ली के नतीजे

पंडित दीनदयाल उपाध्याय की पुण्यतिथि पर बीजेपी दिल्ली विधानसभा का चुनाव एक बार फिर हार गई।यह पार्टी की लगातार छठवीं पराजय है उसी दिल्ली की गलियों में जहां की चौडी,

वर्ड ऑफ ईयर “संविधान” संसदीय सियासत का बदरंग शोर..!

ऑक्सफोर्ड शब्दकोश ने ” संविधान”शब्द को हिंदी वर्ड ऑफ ईयर 2019 घोषित किया है।भारत में बीते बर्ष यह शब्द संसद,सुप्रीम कोर्ट और सड़क पर सर्वाधिक प्रचलित औऱ प्रतिध्वनित हुआ है।ऑक्सफोर्ड

5 ट्रिलियन की इकॉनमी और खैराती भीड़ गढ़ती संसदीय राजनीति

जबाबदेह नागरिक समाज के अपरिहार्य तत्व को खत्म करने की समवेत सहमति बनाती चुनावी राजनीति एक खतरनाक संकेतक है।दिल्ली विधानसभा चुनाव में जिस तरह मुफ्तखोरी की उद्घोषणाए हो रही है

संविधान के सनातन स्तंभ और सेक्युलरिज्म का सियासत

गणतंत्र दिवस विशेष देश भर में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में लोग सड़कों पर संविधान की किताब,बाबासाहब अंबेडकर की तस्वीर और तिरंगा लेकर आंदोलन कर रहे है।इस दलील के

कमिश्नर सिस्टम : क्या आईएएस के मिथक को तोड़ सकते है आईपीएस

नोयडा और लखनऊ में आरम्भ की गई पुलिस आयुक्त प्रणाली के बहाने देश के आईपीएस संवर्ग के समक्ष पुलिस की जनोन्मुखी छवि बनाने की चुनौती भी है। भारत मे परम्परागत

बाल सवाल .. आफ्टरकेयर के मोर्चे पर कहाँ खड़ा है भारत?

“जुबेनाइल जस्टिस एक्ट 2015” भारत मे करीब 20 साल पुराना है।मौजूदा एक्ट सन 2000 औऱ 2006 का अधतन विस्तार है।इसका उद्देश्य भारत के हर बालक को उसकी जन्मजात प्रतिभा और

सत्ता सिंडिकेट के खूंटे से बंधा देश का मैदानी प्रशासन तंत्र..!

तथ्य एक: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, नीतीश कुमार,कमलनाथ, खट्टर ,भूपेश बघेल सभी के जनता दरबार को गहराई से समझिए। एकीकृत और कार्बन कॉपी इस आशय से नजर आयेंगे की यहाँ आने

झूठ ,हिंसा,अफवाह और भय पर खड़े भारत के वाममार्गी ..!

भारत में अल्पसंख्यकवाद को क्यों जिंदा रखना चाहते है वामपंथी वे देश के इतिहास ,संस्कृति, कला,साहित्य,पत्रकारिता और अन्य सभी बौद्धिक क्षेत्रों में एकाधिकार के स्वामी थे।सरकारी सुविधाओं पर टिके ये

राज्य प्रशासन में भी मोदी का अक्स चाहते है लोग

झारखंड का चुनावी सन्देश अबकी बार झारखंड में 65 पार ,हरियाणा और छत्तीसगढ़ में 75 पार, मप्र में 200 पार,राजस्थान में 150 पार, महाराष्ट्र में 200 पार ।यह नारे बीजेपी

भारत में”मतदान व्यवहार “को परिपक्वता देता झारखंड का जनादेश

कैडर के मन की बात को भी समझने की जरूरत अबकी बार 65 पार झारखंड में,हरियाणा और छत्तीसगढ़ में 75 पार, मप्र में 200 पार,राजस्थान में 150 पार, महाराष्ट्र में

बॉरिस जॉनसन की जीत के दक्षिणपंथी निहितार्थ

लेबर पार्टी की शिकस्त नकली सेक्युलरिज्म की भी पराजय है नागरिकता संशोधन कानून के शोर शराबे के बीच एक दूसरी खबर भी भारत में चर्चा का विषय है , ब्रिटिश

मोदी के मुमकिन मैन

संसदीय सियासत में नई इबारत औऱ व्याकरण गढ़ते अमित शाह “मोदी है तो मुमकिन है”यह नारा पिछले लोकसभा चुनावों में जमकर चला।यह भारतीय मतदाताओं को भी खूब भाया और 2014

भरोसे की जमीन तलाशते पुलिस और नागरिक सबंध..!

भारत में मौजूदा पुलिस तंत्र करीब डेढ़ सौ साल पुराना है और इसकी कार्य संस्कृति में आज भी उसी अंग्रेजी हुकूमत का अक्स दिखाई देता है जिसके सरंक्षण और निर्बाध

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