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उम्र अधिक होने पर रखें अपने हड्डियों का ख्याल

कई बार हम डाक्टरों व आसपास के लोगों को कहते सुनते हैं कि हमेशा बैठते उठते व चलते समय सही पोस्चर रखना चाहिए। रीढ़ की हड्डी में लगे छोटे-छोटे वक्र उसे पूर्ण बनाते हैं। यदि रीढ़ की हड्डी को एक साइड से देखा जाए तो उसका आकार एस के जैसे दिखता है। रीढ़ की हड्डी के इन साधारण वक्रों को लोर्डोसिस व काइफोसिस के नाम से जाना जाता है। हालांकि इन वक्रों को गलती से किसी बीमारी या विकार के रुप में नहीं लेना चाहिए।
नई दिल्ली स्थित बत्रा अस्पताल के न्यूरो सर्जरी विभाग के एच ओ डी डॉ अमिताभ गुप्ता का कहना है कि आखिर पोस्चर होता क्या है इसका अर्थ होता है कि रीढ़ की हड्डी के सभी वक्र एक साथ सही दिशा में एलाइन रहें ताकि शरीर का सारा वजन सभी वक्रों पर बराबरी के साथ पड़े व समान रुप में बट जाए। ऐसे में अगर कोई सही पोस्चर में नहीं होता है तो रीढ़ की हड्डी के कुछ भागों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है खासकर कमर के निचले हिस्सें में रीढ़ की हड्डी कभी भी सीधी नहीं होती है। इसके हर भाग में एक मुलायम वक्र अर्थात् हल्का मोड़ सा होता है। निचली ओर जाते हुए इन वक्रों की दिशा आल्टरनेट हो जाती है। इस प्रकार ये स्प्रिंगनुमा हो जाता है जो कि शाक अर्ब्जोप्शन करने में सक्षम हो जाता है। तो हम सोच ही सकते हैं कि यदि रीढ़ की हड्डी सीधी होती तो हमें कितनी दिक्कत हो सकती थी।
हमारी रीढ़ की हड्डी अक्सर रोजाना के कामों द्वारा पडने वाले बोझ व वजन को झेलती रहती है। ऐसे में कभी कभी रीढ़ की हड्डी के बहुत से भाग विकारग्रस्त होने लगते हैं। बढ़ती उम्र के साथ रीढ़ की हड्डी में डीजनरेशन की समस्या उभरने लगती है। कुछ सौभाग्शाली लोग अपने बुढ़ापे में किसी भी परेशानी का सामना नहीं करते हैं लेकिन अधिकतर लोग निम्नलिखित लक्षणों का शिकार हो जाते हैं-हड्डियों के घनत्व में कम,हल्की चोट से भी रीढ़ की हड्डी में फ्रेक्चर,कड़ापन,जोड़ों में समस्या जैसे चलने उठने बैठने व मोडने में परेशानी,बहुत देर तक बैठने व खड़े होने के बाद दर्द, भारी वस्तुओं को उठाने में समस्या, शरीर का लचीलापन समाप्त होना, ठण्ड के समय में कमर में बेहद दर्द व कड़ापन। बढ़ती उम्र के साथ रीढ़ की हड्डी में उभरने वाली बीमारियां-ओस्टियोपोरोसिस, डिस्क डीजनरेशन, स्पाइन ओस्टियोआर्थराइटिस-स्पाइनल स्टेनोसिस आदि।
डॉ अमिताभ गुप्ता का कहना है कि यदि उपचार की बात करें तो बहुत से उपचार उपलब्ध हैं। इनमें से मरीज की स्थिति को देखते हुए सर्वश्रेष्ठ उपचार का चुनाव विशेषज्ञ के द्वारा किया जाना चाहिए। दवाइयों से लेकर इंजेक्शन, सर्जरी आदि सब उपलब्ध है। जहां अन्य प्रक्रियाएं कोई कारगर प्रभाव नहीं दे पाती हैं तब सर्जरी की ओर रुख किया जाता है। अब तो बहुत सी शल्यरहित प्रक्रियाओं के द्वारा सर्जरी भी की जा रही है जिससे मरीज को असानी से अपनी समस्या से छुटकारा मिल जाता है और वह जल्द ही अपनी बेहतर दिनचर्या अपना सकता है।
स्पाइन को स्वस्थ रखने के कुछ टिप्स अपने आहार में पोषक तत्वों को अवष्य ही शामिल करें। धूम्रपान न करें क्यों कि धूम्रपान से शरीर में कुछ ऐसे रसायन प्रवेश करते हैं जो कि स्पाइन तक जाने वाले रक्तप्रवाह को बाधित करते है। अपने शरीर का वजन नियंत्रण में रखें क्यों कि बढ़ता वजन व निकला हुआ पेट स्पाइन पर दोहरी मार कर सकता है। कभी भी ऐसी अवस्था में न सोएं जिससे आप के स्पाइन पर अतिरिक्त दबाव पड़े या दबाव बढ़ेे।

डॉ अमिताभ गुप्ता
एच ओ डी, न्यूरो सर्जरी विभाग, बत्रा अस्पताल

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