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मूवी रिव्यू : थप्पड़

बस एक थप्पड़ ही तो था। क्या करूं? हो गया ना। ज्यादा जरूरी सवाल है ये है कि ऐसा हुआ क्यों? बस इसी ‘क्यों’ का जवाब तलाशती है अनुभव सिन्हा की ये फिल्म थप्पड़। इसका ट्रेलर आपने देखा होगा तो कहानी का मोटा अंदाजा लग गया होगा कि अमृता (तापसी पन्नू) कैसे अपने पति विक्रम के प्रति समर्पित है। उसके ख्वाबों को पूरा करने के लिए जी जान लगाए हुए है और फिर एक पार्टी में सबके सामने अचानक पति के थप्पड़ से उसके सारे सपने चकनाचूर हो जाते हैं। फिर एक औरत की जंग शुरू होती है एक ऐसे पति के साथ, जिसका कहना है कि मियां बीवी में ये सब तो हो जाता है। इतना बड़ा तो कुछ नहीं हुआ ना। लोग क्या सोचेंगे मेरे बारे में कि बीवी क्यों भाग गई? जिस औरत की सास उससे ये कहती है कि घर समेट कर रखने के लिए औरत को ही मन मारना पड़ता है। जिस लड़की की अपनी मां उससे तलाक लेने का फैसला सुनकर यह कहती है कि यही सुनना रह गया था कि बेटी तलाक लेगी? क्या गलती हो गई थी हमसे? आसपास ऐसे लोगों से घिरी अमृता पूरे घटनाक्रम को कैसे आगे ले जाती हैं और अंत में क्या होता है, इस बात का अंदाजा ट्रेलर देखकर कतई नहीं लगाया जा सकता।
फिल्म का नाम सुनकर लगता है कि फिल्म घरेलू हिंसा पर आधारित है और न जाने कितनी मारधाड़ और चीख चिल्लाहट इस फिल्म में होगी। और अंत क्या होगा? पति से अलग हो जाती होगी या उसे माफ करके आगे बढ़ जाती होगी।

इस सब्जेक्ट पर इससे पहले ऐश्वर्या की प्रोवोक्ट के बेहद हिंसक अंत का ऑप्शन भारतीय दर्शक पहले देख ही चुके हैं। लेकिन बिना हिंसक हुए और बिना भाषणबाजी दिखाए, डायरेक्टर अनुभव सिन्हा ने कहानी का अंत एक ऐसे खूबसूरत मोड़ पर किया है, जिसे सोच पाने की क्षमता अभी तक हमारे भारतीय पुरषसत्तात्मक समाज में तो बिल्कुल न के बराबर है। फिल्म में एक जगह कहा भी गया है कि अगर एक थप्पड़ पर अलग होने की बात हो जाए तो 50 परसेंट से ज्यादा औरतें मायके में हों। करीब सवा दो घंटे की इस फिल्म के पहले हाफ में अमृता और विक्रम की अपर मिडल क्लास फैमिली की जिंदगी के सपने, उम्मीदें और उन्हें पूरा करने की जद्दोजहद में निकल जाता है। इस दौरान पति पत्नी के बीच प्यार और पत्नी के समर्पण को कहानी में विकसित किया गया है। और फिर जब भरी पार्टी में लगे थप्पड़ की गूंज वहां मौजूद किसी को सुनाई नहीं देती तो तापसी किस तरह उस थप्पड़ के मायने समझकर अपनी जिंदगी जीने का तरीका बदलती हैं इसे फिल्म के दूसरे हिस्से में रखा गया है। तापसी के अलावा फिल्म में साथ साथ पांच और औरतों के जीवन के अंतर्विरोध दिखाए गए है। पांच अलग अलग तबके से जुड़ी इन औरतों के जरिए अनुभव ने औरत की हर तकलीफ को परदे पर उतार दिया। एक किरदार तापसी की मेड है जो पति से मार खाने को ही अपना जीवन समझती है, लेकिन तापसी का सफर कैसे उसे हिम्मत देता है उसके स्टाइल में। दूसरी औरत तापसी की मां (रत्ना पाठक), जिसकी जिंदगी बेहद सामान्य और अन्यथा बेहतर और प्रोग्रेसिव है और लगातार बेटी को पति से अलग न होने की सलाह ही देती है, लेकिन फिल्म का अंत आते आते वह भी अपने साथ हुए अन्याय को महसूस करने लगती है जिसका जिक्र उसने अपने पति से कभी करना जरूरी समझा ही नहीं।

तापसी के इस बेहद प्रोग्रेसिव पिता (कुमुद मिश्रा) को तब झटका लगता है जब उन्हें अहसास होता है कि उन्होंने अपनी पत्नी के सपने को कभी जानना जरूरी समझा ही नहीं। तीसरा किरदार है, तापसी की अपनी सास (तन्वी आजमी) जो खुद की पहचान ढूंढने के लिए पति से अलग बेटे के साथ रहती तो है, लेकिन जब बहू को अपना बेटा थप्पड़ लगा रहा है तो उस बात को वह यह कहकर अनदेखा करती है कि बेटा परेशान था, हो गया उससे। और अगले दिन भी बहू से उसका हाल पूछने के बजाय ये पूछती है कि विक्रम रात को ठीक से सोया ना? चौथी कहानी फिल्म में चलती है तापसी की वकील नेत्रा की, जिसे बेहद दमदार तरीके से निभाया है माया सराओ ने। नेत्रा जयसिंह एक कामयाब वकील होने के साथ साथ मशहूर न्यूज एंकर मानव कौल की पत्नी हैं और बेहद कामयाब वकील की बहू। दो पुरुषों की कामयाबी किस तरह उसके व्यक्तित्व और अचीवमेंट को दबा रही है, इसका अंदाजा तापसी का केस लड़ने के दौरान नेत्रा को होता है और फिल्म के अंत में वह बेहद शालीनता से साहसिक कदम उठाने से नहीं चूकतीं। पांचवा किरदार तापसी के भाई की गर्लफ्रेंड का है जो तापसी के साथ उस वक्त खड़ी होती है जब तापसी का भाई तक उसके फैसले से खुश नहीं है। अपने बॉयफ्रेंड से उसका रिलेशन कैसे मोड़ से गुजरता है, यह भी अपने आप में बेहद पावरफुल तरीके से दिखाया गया है।

कलाकार : तापसी पन्नू, पवेल गुलाटी, दिया मिर्जा, कुमुद मिश्रा, राम कपूर, रत्ना पाठक शाह, तनवी आजमी
निर्देशक : अनुभव सिन्हा
मूवी टाइप : ड्रामा
अवधि : 2 घंटा 6 मिनट

फिल्म का बेहतरीन हिस्सा है उसका अंत। यह इसलिए क्योंकि फिल्म देखते रहने के दौरान हमारे सामाजिक ढांचे और हमारी परवरिश के कारण कई बार एक सवाल हमारे मन में आ सकता है कि तापसी क्यों इतनी कठोर हो रही हैं? एक थप्पड के कारण घर तोड़ना सही नहीं है। एक चांस तो दे देना चाहिए या शायद दे ही देगी अंत तक। इन सब सवालों का हल कहानी के अंत में दिया गया है। डायरेक्टर ने एक ऐसा हिंट या क्लू पुरुषों को दिया है कि जिसे वह समझ जाए तो घर टूटने की नौबत नहीं आए, क्योंकि घर टूटने का खामियाजा पुरुषों से ज्यादा औरतों को भुगतना पड़ता है। तापसी ने एक पति को समर्पित पत्नी से लेकर थप्पड़ बस इतनी सी बात नहीं है का विश्वास जगाने वाली औरत के एक एक अहसास को गहराई से महसूस किया है जो परदे पर साफ दिखता है। थप्पड़ खाकर अपने कमरे तक पहुंचने के लिए की गई वॉक में तापसी का चेहरा हर उस औरत को आईना दिखाती है जो परिवार के लिए सब कुछ करने के बाद भी किसी लायक नहीं समझी जाती और सब कुछ आसानी से सहन कर लेती है।

अनुभव सिन्हा और मृणमयी लागू ने पूरी फिल्म को ऐसे लिखा है जिसमें हमारे समाज की कड़वी सचाई छह अलग अलग किरदारों के जरिए सामने आती है। फिल्म का अंत उन सभी किरदारों के अच्छे और बुरे पहलू, मन में चलने वाली उलझनें, द्वंद्व और अंतरविरोधों को न सिर्फ सबके सामने रखती है बल्कि पूरे समाज को एक-एक ऑप्शन भी देकर जाती है, ताकि लाइफ जीने लाय

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