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भारतीय संस्कृति के अंतर्गत मनाए जाने वाला व्रत करवा-चौथ में छिपे मर्म को जाने

 भारतीय संस्कृति के अंतर्गत मनाए जाने वाला पर्व करवा-चौथ में छिपे मर्म को जाने

(श्री आशुतोष महाराज जी )
इस माह दशहरा व दीपावली के साथ एक और त्यौहार भी घर-आंगन में दस्तक दे रहा है। कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को मनाया जाने वाला यह पर्व है करवा-चौथ का। भारतीय त्यौहारों में यह एक ऐसा उत्सव है जो पति-पत्नी के संबंध का परिचायक है। करवा-चौथ के दिन पतिव्रता स्त्रियाँ अपने पति के कुशलक्षेम व दीर्घ आयु के लिए व्रत रखती हैं। सूर्योदय से पूर्व तारों की छाँव में सर्गी खाने के पश्चात्‌ इस उपवास का प्रारंभ होता है। व्रतधारियाँ पूरा दिन अन्न-जल ग्रहण नहीं करतीं। रात को चंद्रमा का दर्शन करने व उसको जल अर्पित करने के बाद ही व्रत पूर्ण होता है। उसके बाद ही स्त्रियाँ जल तथा अन्य खाद्य पदार्थ ग्रहण करती हैं।
पर भारतीय संस्कृति के अंतर्गत मनाए जाने वाले पर्व व व्रत मात्र बाहरी परंपराओं तक ही सीमित नहीं होते। उनके मध्य आत्मोन्‍नति हेतु विराट व गूढ़ संदेश निहित होते हैं। यदि पर्वों में निहित उन मार्मिक संदेशों को न समझा जाए, तो पर्वों की परंपराएँ मात्र अंधप्रथाएँ बनकर रह जाती हैं। उनकी वास्तविक गरिमा कहीं लुप्त हो जाती है। तो चलिए, करवा-चौथ के त्यौहार में छिपे मर्म को जानने का प्रयास करते हैं। सबसे पहले बात करते हैं, उस कथा की जिसे सभी व्रतधारी स्त्रियाँ इस दिन पूजा के समय पढ़ती हैं। रानी वीरां की यह कथा मनुष्य की आत्मिक उन्नति के कई अनमोल रत्न अपने भीतर समेटे हुए है। दरअसल, इस कहानी में वीरां प्रतीक है- जीवात्मा अथवा साधक की। उपवास सूचक है- ईश्वर का सामीप्य प्रदान करने वाली ध्यान-साधना का! इस साधना को, यानी प्रयास को एक साधक को तब तक जारी रखना होता है, जब तक उसका चंद्रमा यानी परमात्मा से मिलन न हो जाए।
किन्तु प्रकाश स्वरूप परमात्मा तक पहुँचने की राह सरल नहीं होती। जीव को अनेक बाधाओं व संघर्षों का सामना करना पड़ता है। इस साधना मार्ग पर अनेकानेक मायावी भ्रम अथवा भुलावे भी जीवात्मा के सामने आते हैं। ठीक जैसे कि वीरां के भाइयों ने चंद्रमा के उदित होने का भ्रम उत्पन्न किया। वीरां उसे सच समझ बैठी और उसने भोजन ग्रहण कर लिया। परिणामत: उसका व्रत अथवा साधना पूर्ण नहीं हो पाई। वह अपने लक्ष्य को साध नहीं पाई, अर्थात्‌ उसके पति की मृत्यु हो गई। ठीक यही स्थिति पथ से भ्रष्ट साधक की भी होती है। वह भी प्रभु मिलन की राह पर निकलता तो है, यात्रा आरंभ तो करता है। परन्तु सांसारिक छलावों के प्रभाव में आकर भ्रमित हो जाता है। माया में ऐसा उलझता है कि अपना उपवास (साधना) पूर्ण नहीं कर पाता। नकली चंद्रमा अर्थात्‌ आकर्षणों में फंसकर अपना उपवास तोड़ देता है, माने अपनी साधना खण्डित कर बैठता है। इसलिए उसके पति की मृत्यु हो जाती है, यानी परमात्मा से उसका मिलन नहीं हो पाता।  पर जब वीरां को आभास हुआ कि उससे गलती हो गई है, तो उसने गणेश जी की आराधना कर पुन: निष्ठा से उपवास किए और उन्हें पूरे प्राणपन से निभाया।

फलत: वीरां का पति जीवंत हो उठा। पति-पत्नी का मिलन हुआ। गणेश जी प्रतीक हैं- विवेक के, सद्बुद्धि के। साधक भी जब विवेक से चलता हुआ पुन: प्रयास करता है, तो वह भी माया के फंदों को तोड़ने में सफल हो जाता है। सद्गुरु से प्राप्त ब्रह्मज्ञान की साधना करता हुआ, वह अपने लक्ष्य परमात्मा को प्राप्त कर लेता है। एक दिन यह जीवात्मा अपने स्रोत परमात्मा में विलीन हो जाती है। यही कहलाता है, आत्मा-परमात्मा (पति-पत्नी) का शाश्वत मिलन! शास्त्र ग्रंथ भी इस दिव्य संबंध को परिभाषित करते हैं। भागवत में वर्णित है- वासुदेव: पुमोनेक: स्त्रीभयमितरज्जगत्‌। अर्थात्‌ इस जगत में केवल एक ही पुरुष हैं। वे हैं, परम-आत्मा वासुदेव। शेष सभी आत्माएँ तो नारी हैं।
अत: आत्मा (नारी) को सद्गुरु के सान्निध्य में परमात्मा (परम पुरुष) से मिलन करने का संदेश देता है, करवा-चौथ का पर्व! एक बार गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी से एक साधक ने यह प्रश्न किया- ह्यमहाराज जी, करवा-चौथ के पर्व का क्या माहात्म्य है?ह्ण तब समाधान प्रदाता गुरुदेव ने सहज अंदाज में शास्त्रों की इसी गूढ़ता को उजागर किया। वे बोले- ह्यकरवाह्ण माने ह्यकरोह्ण और ह्यचौथह्ण मतलब ह्यचार पदार्थह्ण। जब शिष्य पूर्ण गुरु की शरणागत होकर ब्रह्मज्ञान द्वारा चार पदार्थ का अनुभव करता है, तब उसके जीवन में यह पर्व सम्पन्न होता है। उसके बाद ही जीवात्मा का परमात्मा से मिलन संभव होता है। गुरु ही शिष्य के मार्ग में आने वाली हर दुविधा के सम्मुख उसकी ढाल बनकर सहायता करते हैं। सारी विपरीतताओं को पार करा आत्मा का परमात्मा से अटूट मिलन करवा देते हैं। ऐसा करने का सामर्थ्य मात्र ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु ही रखते हैं। अत: यह पर्व गुरु-शिष्य संबंध को प्रगाढ़ करने का संदेश देता है।

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