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मीडिया, सरकार और सच्चाई के बीच पिसती आम जनता

मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है तथा स्पष्टता, वास्तविकता और सच्चाई को हम मीडिया का प्रतीक मान सकते हैं जबकि सरकार को वह स्तंभ कहा जाता जा सकता है जिसके चारों ओर मीडिया घूम रही है और उसके हर एक कदम का विश्लेषण कर रही है। यह कहना गलत न होगा कि अगर मीडिया ना हो तो सरकार के फैसलों पर कभी उचित विमर्श ही न हो पाएगा। मीडिया वह हांडी है जिसमें सरकार के हर फैसले को मथा जाता है और फिर उसे जनता के लिए परोस दिया जाता है। मीडिया अगर किसी भी फैसले को सात्विक तरीके से मथती है कि तो उसका परिणाम जनता के ऊपर भी सकारात्मक होगा और अगर मीडिया सरकार के किसी फैसले को मिर्च-मसाला डालकर मथती है तो जनता पर उसका असर भी मसालेदार ही होगा।
एक वास्तविकता यह है कि मीडिया के उस सात्विकता का युग शायद अब समाप्त हो चुका है। दरअसल, यह युग डिजिटलीकरण और टेक्नोलॉजी का है। अतः हर चीज एडिटेड और अफेक्टेड है। तभी शायद सीधे-साधे सिर्फ खबर सुनाने वाले न्यूज़ अब किसी को पसंद नहीं आते। अब टीवी में न्यूज़ सुनते वक्त बैकग्राउंड म्यूजिक ना हो और सिचुएशन के हिसाब से म्यूजिक ना बदले तो न्यूज़ देखने का मजा नहीं आता। मिनटों में 100 खबरें दिखा दी जाती हैं हैं। चैनलों पर अब वास्तविक खबरें कम और तर्क वितर्क बहसबाजी ज्यादा होती होती है और न्यूज़ रूम की डिबेट को ‘दंगल’ तक घोषित कर दिया जाता है। शायद इसलिए अब रेडियो चैनल्स खत्म हो चुके हैं। आज बिक वही रहा है जो बेहतर दिख रहा है और जनता वही देखना पसंद कर रही है जो ज्यादा मसालेदार है।
लेकिन इन सबके बीच मीडिया की जो वास्तविक बेदाग पहचान है वह कहीं ना कहीं धूमिल होती जा रही है। मीडिया पर पक्षपात के आरोप लग रहे हैं। फिलहाल टीवी मीडिया का एक धड़ा जहां सरकार के हर फैसले का आंख बंद कर समर्थन करता दिख रहा है तो वहीं दूसरी तरफ एक तबका ऐसा भी है जो सरकार के हर फैसले को अपने तर्क से गलत सिद्ध करने को आमादा है। यकीन करना मुश्किल है कि कौन सही है और कौन गलत।
ऐसा नहीं है कि आज से पहले कभी पत्रकारों और मीडिया के ऊपर बिकने के आरोप नहीं लगे किंतु जिस प्रकार अभी की स्थिति है वैसी पहले कभी नहीं रही। यह भी सत्य है कि आज हर एक चैनल शक के घेरे में है। स्थिति की दयनीयता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज खबर देखने से पहले दर्शक को यह पता होता है कि कौन सा न्यूज़ चैनल किस फैसले को किस नजर से देखेगा और क्या प्रतिक्रिया देगा। इसलिए दर्शक भी बंट गए हैं और दर्शक उसी चैनल को देखना पसंद करते हैं जो उनके विचारों के मुताबिक खबरों को परोसते हैं।
इन सबके बीच अगर कोई पीस रहा है तो वह है देश की आम जनता जिसे ना राजनीति की अच्छी समझ है, न ही अर्थशास्त्र की। लोग आज भी न्यूज़ चैनलों को देखकर ही अपने मन में सरकार के किसी फैसले का समर्थन या विरोध करते हैं। न्यूज़ चैनलों की खबरों को सुनकर ही लोग चौक चौराहों पर बहसों में अपने विचार प्रकट करते हैं। समस्या तब और विकट हो जाती है जब सरकार कोई ऐसा फैसला कर दे जो धार्मिक मुद्दे पर हो। उदाहरण के तौर पर हम सीएए और एनआरसी जैसे मुद्दे को देख सकते हैं।
ऐसे मुद्दों पर चूंकि आम जनता को कोई खास जानकारी होती नहीं, तो वे सीधा न्यूज चैनल का दरवाजा ख़टखटाते है और चूंकि आज जानता के मन में ये बात बैठी हुई है कौन सा न्यूज चैनल किसके पक्ष में बोलेगा तो जनता अपने विश्वास के मुताबिक उक्त चैनल की शरण मे पहुँच जाती है। वहां उसे वास्तविक खबर नही मिलती बल्कि वह खबर मिलती है जो चैनल उन्हें अपने फायदे के लिए दिखाना चाहता है।
सत्य तो यह है की यह सब विचारधारा की खेल या लड़ाई है जिसमें सत्य और वास्तविकता कहीं गुम होती सी प्रतीत हो रही है। मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ न होकर एक खास विचारधारा का रक्षक और समर्थक बनता दिख रहा है किन्तु दूसरी तरफ जनता विवश है क्योंकि उसके पास कोई और विकल्प नही है, उन्हें घूम फिर कर इन्ही दो पक्षो में से किसी एक को चुनना है।

विवेकानंद विमल

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