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शाहीन बाग में धरना देने वाले अब घेरे पाक एंबेसी को

पाकिस्तान में उपद्रवी भीड़ ने पिछले शुक्रवार को ननकाना साहिब गुरुद्वारे पर जिस तरह से पत्थरबाजी की उससे समूचे भारत में और विश्व भर के सिख समुदाय में उदासी और गुस्से का माहौल है। ननकाना साहिब गुरुद्वारे को सिखों के सबसे पवित्र धर्मस्थलों में से माना जाता है। ननकाना साहिब, सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी का जन्मस्थान है। बाबा नानक सारे देश के लिए पूज्यनीय और आदर्श पुरुष हैं।

आपने घटना से जुड़े विडियो में एक कट्टरपंथी कठमुल्ले को सिखों को ननकाना साहिब से भगाने की धमकी देते देखा होगा। वह लफंगा शख्स इस पवित्र शहर का नाम बदलकर गुलाम अली मुस्तफा रखने की धमकी भी देता दिखाई दे रहा है। पर हैरानी इस बात से भी हो रही है कि ननकाना साहब गुरु द्वारा में हमला हो गया और कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू की कोई प्रति क्रिया नहीं आई। उन्होंने अपने मित्र और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को फोन करके घटना की न तो निंदा की और न ही पत्थरबाजों को सख्त सजा देने की मांग की। वे तो इमरान खान का अपने को बहुत करीबी कहते-बताते रहते हैं। इसी तरह से भारत में आजकल सीएए और एनआरसी के खिलाफ राजधानी के शाहीन बाग में धरना देने वाले भी सामने नहीं आए। उन्होंने भी ननकाना साहिब पर हमले पर मौन व्रत रखा। क्या उन्हें पाकिस्तान हाई कमिशन के बाहर धरना या प्रदर्शन करके अपना विरोध भी नहीं जताना चाहिए था? पर इस तरफ किसी ने सोचा तक नहीं। यह बेहद शर्मनाक और दोगला चरित्र है। किसी स्तर पर कोई बयानहबाजी भी नहीं हुई। जानकारों को पता है कि ननकाना साहिब के होटलों में सिखों को अलग बर्तनों में भोजन तक परोसा जाता है। यह लाहौर से 80 किमी दूर है। पाकस्तान में सिखों की स्थिति अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों से भी खराब है।

सारी दुनिया ने यह देखा कि ननकाना साहिब में भीड़ ने गुरुद्वारा पर पत्थरबाजी की और उसे पहले घेर लिया। बढ़ते दबाव के बाद पाकिस्‍तान की पुलिस ने सिख लड़की जगजीत कौर के अपहरण के आरोपी एहसान को छोड़ दिया। दरअसल कट्टरपंथियों की कार्रवाई के कारण ननकाना साहिब में नियमित भजन-कीर्तन तक को रद्द करना पड़ा है। यह कोई सामान्य बात नहीं है। गुरु गोविंद सिंह जी के गुरुपुरब के मौके पर अखंड पाठ शुरू होने वाला था। सिख समुदाय के लोग गुरुद्वारे के अंदर फंसे हुए थे। पूरे इलाके में दहशत का माहौल था।

महत्वपूर्ण है कि मौजूदा पाकिस्तान में सिख धर्म की व्यापक विरासत और इतिहास है, हालांकि अब वहां पर सिखों की आबादी बहुत कम रह गई है। अधिकांश सिख पंजाब प्रांत में ही रहते हैं। कुछ सिख ख़ैबर पख़्तूनख़्वा प्रांत में भी है। पाकिस्तान के ननकाना साहिब में यह वाकया ऐसे वक्त हुआ है जब भारत में संशोधित नागरिकता कानून के खिलाफ देशभर में प्रदर्शन हो रहे हैं। संशोधित कानून के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से धार्मिक आधार पर प्रताड़ना का शिकार हो भारत आए हिंदू, सिख, ईसाई, पारसी, जैन और बौद्ध शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रावधान किया गया है।

दरअसल आज़ादी के बाद से ही पाकिस्तान में सिखों पर जुल्म लगातार होते ही रहे हैं। वहां दो साल पहले शिखर समाजसेवी सरदार चरणजीत सिंह का कत्ल कर दिया गया था। उनके हत्यारों का अभी तक कोई सुराग नहीं मिला है, न मिलने की उम्मीद है। यह हादसा पेशावर में हुआ था। देश के बंटवारे के बाद पेशावर में हुए कत्लेआम के कारण वहां से लगभग सभी सिख चले गए थे या उन्हें बर्बरता पूर्वक मार डाला गया था। उनके गुरुद्वारों को भी कोई देखने वाला तक नहीं था। पर हाल के सालों में वहां के जीर्ण-शीर्ण हाल में खड़े गुरुद्वारों को पाकिस्तान के दूसरे शहरों में बसे सिखों ने आकर देखना चालू करा था। चरणजीत सिंह भी कुछ बरस पहले खैबर पख्तूनख्वाह सूबे को छोड़कर पेशावर में बसे गए थे। वे एक सामाजिक कार्यकर्ता थे और मुख्य रूप से सिखों के बीच में सामाजिक और कल्याणकारी कार्य करते थे। उनके पेशावर आने के बाद ख़ैबर पख़्तूनख्वाह के सैकड़ों सिख उनके साथ ही पेशावर में आ गए थे। उनके कत्ल ने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की बदत्तर होती हालत को सिद्ध ही किया था।

पाकिस्तान में 2017 में हुई मतगणना में भी सिखों के साथ भेदभाव हुआ था। उनका जनगणना विभाग के फॉर्म में जिक्र तक नहीं था। हालांकि बाकी धर्मो का उल्लेख था। उन्हें एक तरह से ‘अन्य’ की कैटेगरी में धकेल दिया गया था। पाकिस्तान में हिन्दू, सिख और ईसाई रमजान के दिनों में इफ्तार का आयोजन करते हैं। यह एक तरह से भय के कारण ही होता है। अल्पसंख्यकों को लगता है कि इफ्तार जैसे आयोजन करके वे मुसलमानों के बीच अपनी जगह बना सकेंगे। इसके विपरीत, पाकिस्तान में यह सुनने तक में नहीं आता कि मुसलमान कभी भी दिवाली, होली या क्रिसमस के अवसरों पर हिन्दुओं, सिखों या ईसाइयों के लिए कोई आयोजन करते हों। वहां पर सारा मामला ही एक तरफा है। पाकिस्तान के बचे-खुचे हिन्दू मंदिरों में भी इफ्तार आयोजित की जाती है। कहना न होगा कि जिस देश में लगभग 95 फीसद मुसलमान हों वहां पर बहुसंख्यक समाज को धार्मिक सौहार्द के लिए कार्यक्रम आयोजित करने के संबंध में सोचना चाहिए। पर जिन्ना के घनघोर इस्लामिक मुल्क में यह होता ही कहां हैं। उस पाकिस्तान के मुसलमान अब भी गैर-मुसलमानों के बर्तनों में भोजन करने से परहेज करते हैं। जैसा कि हमने बताया कि सिखों की जनगणना में भी अनदेखी ही हुई। दो दशकों के बाद हुई जनगणना को लेकर सिख खासे नाराज थे। उनका सरकार को लेकर गुस्सा वाजिब था।

उन्हें जनगणना में दरकिनार किया गया था। जनगणना फॉर्म में अलग से सिखों के लिए कॉलम तक नहीं बनाया गया जबकि दूसरे धर्मों को उसमें जगह दी गई थी। पहली जनगणना के दौरान सिखों की अनदेखी और अब उनके सामाजिक-सियासी नेता की हत्या से पाकिस्तानी सिख मर्माहत है। वे निरीह भाव से सारी स्थिति को देख रहे हैं। पर उनके पास कोई विकल्प नहीं हैं।

पर इस बार ननकाना साहिब पर हमले से हर कोई इंसान व्यथित होगा। विश्व बिरादरी को इस तरफ नोटिस लेना चाहिए। भारत को पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की दयनीय स्थिति को विश्व मंच से उठाना होगा।

आर.के. सिन्हा
लेखक राज्य सभा सदस्य हैं
सी-1/22, हुमायूँ रोड
नयी दिल्ली

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