National Hindi Daily Newspaper
ब्रेकिंग न्यूज़

आखिरी चरण के फेफड़ों के कैंसर से ग्रस्त मरीज को मिला नया जीवन

नई दिल्ली। विश्वस्तर पर सबसे अधिक मृत्युदर के साथ, फेफड़ों का कैंसर सबसे घातक कैंसरों में से एक माना जाता है। जागरुकता में कमी के कारण लोग इसके लक्षणों को समझने में चूक जाते हैं (टीबी समझ बैठते हैं) जिसके कारण बीमारी की पहचान देर से होती है। परिणामस्वरूप अधिकतर मरीजों में कैंसर गंभीर होता जाता है जिससे उनकी जान का खतरा बनता है। मैक्स अस्पताल ने आज 76 वर्षीय मरीज, त्रिपाठी के टेस्टीमोनियल को साझा किया, जिन्होंने फेफड़ों के कैंसर के खिलाफ अपनी लड़ाई जीत ली है और अब एक स्वस्थ जीवन जी रही हैं। फेफड़ों का कैंसर या फेफड़ों का कार्सिनोमा, कैंसर के कारण होने वाली लगभग 20% मौतों के लिए जिम्मेदार माना जाता है।
हालांकि, यह मामला खुद इस बात की पुष्टि करता है कि ऑन्कोलॉजी के क्षेत्र में प्रगति के साथ चौथे चरण के फेफड़ों के कैंसर का भी सफल इलाज संभव है। इसकी मदद से न सिर्फ मरीज को एक नया जीवन मिलता है बल्कि उनके जीवन की गुणवत्ता भी बेहतर हो जाती है। इसलिए इस घातक बीमारी के मामलों में कमी लाने के लिए अधिक से अधिक लोगों को जागरुक करना आवश्यक है। 2009 में जब त्रिपाठी 65 वर्ष की थीं, तब उनके दाएं फेफड़े में चौथे चरण के मेटास्टेटिक कैंसर की पहचान हुई थी। क्रोनिक किडनी डिजीज़ (सीकेडी) के इतिहास के साथ उनकी सर्वाइकल लिंफ नॉड्स में सूजन पाई गई। परीक्षणों से पता चला कि एडवांस चरण के साथ उनका कैंसर शरीर के अन्य अंगो में फैल चुका था। वहीं पेट-सीटी स्कैन की मदद से मरीज के फेफड़े के ऊपरी दाएं हिस्से में घातक एडेनोमाकार्सिनोमा की पुष्टि हुई। पटपड़गंज स्थित मैक्स सुपर स्पेशलिटी अस्पताल की निदेशक मीनू वालिया ने बाताया कि, “मूल्यांकन के बाद ऑन्कोलॉजिस्ट की हमारी टीम ने मेडिकेशन के 6 साइकल के साथ मरीज को कीमोथेरेपी पर रखने का फैसला किया। इसकी मदद से उनकी स्थिति स्थिर हो गई और हमने उन्हें बार-बार अस्पताल आने की सलाह दी। 6 साल बाद उनमें कैंसर की कोशिकाएं हल्की बढ़ी हुई पाई गईं। 2019 में स्कैन करने पर पता चला कि कैंसर पूरे फेफड़े में फैल चुका है। इसके बाद हमने ओरल और टार्गेटेड थेरेपी के साथ उनका सफलतापूर्वक इलाज किया। श्रीमती त्रिपाठी की हालत में अब सुधार है और वह एक स्वस्थ जीवन जी रही हैं।”
इलाज के बाद से मरीज एक सुखद और बेहतर जीवन जी रही है। चूंकि, बीमारी की शुरुआती पहचान के साथ मरीज की जान बचने की संभावना ज्यादा होती है इसलिए लोगों के बीच इसके बारे में जागरुकता बढ़ाना आवश्यक है। समय पर निदान और रुटीन चेकअप कैंसर की शुरुआती पहचान और उचित इलाज की कुंजी हैं। डॉक्टर मीनू वालिया ने आगे बताया कि, “चौथे चरण के कैंसर के बाद भी श्रीमती त्रिपाठी पूरे 10 सालों तक कैंसर के खिलाफ अपनी जंग लड़ती रहीं। आखिर में बिना सर्जरी की जरूरत पड़े उनकी जान बचाई गई। हालांकि, नई और एडवांस तकनीकों और उचित थेरेपी के साथ अब कैंसर का न सिर्फ एडवांस स्टेज में बल्कि अधिक उम्र वाले लोगों में भी सफल इलाज संभव है। बीमारी की शुरुआती पहचाने के लिए सभी को समय-समय पर स्क्रीनिंग कराते रहना चाहिए।”।

Print Friendly, PDF & Email
Skip to toolbar