न्यूज के लिए सबकुछ, न्यूज सबकुछ
ब्रेकिंग न्यूज़

अब भी ये सवाल खड़ा है कि देश मे बेटियां कैसे बचेगी

निर्भया को पिछले सात साल से इंसाफ का इंतजार है। तमाम कवायदों के बाद उम्मीद है कि अब 22 जनवरी को सुबह सात बजे दिल्ली की तिहाड़ जेल में निर्भया के बलात्कारियों और हत्यारों को फांसी दे दी जाएगी। फैसले के इंतजार मे पिछले सात साल से हर बार दिसम्बर मे निर्भया का दर्द ताजा हो जाता है।लेकिन निर्भया के आरोपियों को सजा के एलान के बाद उसकी असहनीय पीड़ा एक बार फिर दिल को रौंदती,गमगीन करती है।दिमाग मे पूरी घटना की फिल्म घूमने लगती है।उस सर्द रात मे वह शहर भर मे कैसे घूमती रही होगी।ये बदहाल व्यवस्था पर तमाचा तो ही था कि निर्भया सड़क के किनारे पड़ी दर्द से कराह रही थी,पर उसे समय से अस्पताल पहुंचाने वाला कोई नही था? राजधानी थी रात मे सड़कों पर पुलिस का पहरा रहा होगा,फिर भी निर्भया अकेली थी। 6 हैवान पुरुषो द्वारा एक मासूम लड़की के साथ निर्ममता से बलात्कार, बलात्कार के बाद उसके शरीर के साथ जो हैवानियत की उस हैवानियत को बयां करने के लिए कोई शब्द नही है।आजाद देश के लोकतांत्रिक ढ़ाचें मे तंत्र के नकरापन की इससे ज्यादा दहला देने वाली दांसता नही मिलेगी बहरहाल अब फैसले की घड़ी आ गयी है ,अदालत ने हैवानों की मौत की तारीख तय कर दी है और उनको अपने किये की सजा मिल भी जायेगी।पिछले सात साल से भी ज्यादा समय से समाज के सीने पर ये पड़ा हुआ था। यह एक खराब उदाहरण बन गया था। जब भी देश में बलात्कार या महिलाओं से अत्याचार की कोई घटना घटती थी, तब यही कहा जाता था कि इस तरह की घटनाएं कैसे रुक सकती हैं, जब इतने समय बाद भी हम निर्भया के हत्यारों को सजा तक नहीं दे सके।।ऐसी ही हैवानियत की शिकार तेंलगगाना की प्रियंका को पुलिस से 24 घंटे मे ही इंसाफ मिल गया था।
लेकिन अब भी ये सवाल खड़ा है कि देश मे बेटियां कैसे बचेगी।बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओं के जोरदार नारे के साथ साल 2012 के बाद देश मे बने सख्त कानून के बावजूद लगातार बढ़ते गैंगरेप इस बात की ओर इशारा करते हैं कि कानून का डर अब खत्म सा हो चुका है। निर्भया कांड हो या बदायूं कांड, छोटा शहर हो या महानगर, विदेशी महिला हो या गांवदेहात की। पुरुषों द्वारा किए जाने वाले गैंगरेप की घटनाएं पिछले कुछ सालों से तकरीबन हर रोज की खबर बन गई हैं।अब तक समाज एकल बलात्कार से ही परेशान था, अब तो सामूहिक बलात्कार आम बात होती चली जा रही है। इस में पीडि़ता के बचने की संभावना न के बराबर होती है। देश के कोने कोने में, एक के बाद एक निर्भया, कहीं हैदराबाद में तो कहीं उन्नाव में तो कहीं रांची में तो कहीं मुजफ्फरपुर में, देश के न जाने कितने हिस्सों में, कहीं जलती, कहीं जलाई हुई, कहीं बालिग तो कहीं बच्ची, तो कहीं कमसिन, कई-कई रूपों में दिखने लगीं है।अक्सर ये कहा जाता है कि देश मे न्याय प्रक्रिया लम्बी है।ये सही भी लगती है ,निर्भया का फैसला आते आते सात साल लग गये।देश मे बलात्कार के मामले मे अब तक जो एक मात्र फांसी कोलकाता में एक 15 वर्षीय स्कूली छात्रा के साथ बलात्कार और उसकी हत्या के मुजरिम धनंजय चटर्जी को दी गयी थी। 14 साल तक चले मुक़दमे और विभिन्न अपीलों और याचिकाओं को ठुकराए जाने के बाद धनंजय को कोलकाता की अलीपुर जेल में फांसी दी जा सकी थी।लेकिन हैदराबाद की पशु चिकित्सक प्रियंका को इंसाफ पुलिस ने आरोपियों को ढ़ेर कर दिला दिया।
पुलिस पर फूल बरसाएगये, पूरे विश्वास के साथ कहा गया कि पुलिस ने जो किया उससे डर पैदा होगा, कोई अब ऐसा काम करने की हिम्मत नहीं करेगा।हैदराबाद में हुए एनकाउंटर के बाद तो यह भी कहा जाने लगा है कि समय रहते न्याय मिलने की उम्मीद होती तो शायद ऐसा नहीं होता। यानी बात सिर्फ न्याय पर आकर अटकती है। प्रश्न यह है कि यह न्याय हर स्तर पर मिले कैसे? लेकिन हैदराबाद मे पुलिस की कार्यवाही के दूसरे ही दिन आठ दिसंबर की रात ओडिशा के संबलपुर जिले में एक महिला के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना घटी।जुर्म करने वालों की हिम्मत को कम आंका जाने का सुबूत बहुत ही जल्दी प्राप्त हो गया। गोलियों की ठांय-ठांय अगर त्वरित और सही इंसाफ होता तो ये पहले ही नजीर बन चुका होता।क्यों कि हैदराबाद एनकाउंटर देश का पहला एनकाउंटर नही था।सन 1984 मे मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले मे एक ढ़ाई साल की मासूम के साथ 31 वर्ष के युवक ने क्रूरता की थी।थाना प्रभारी ए उपाघ्याय घटना स्थल पर आरोपी को ले जाने के बाद अपने रोक नही पाये थे और कई गोलियां आरोपी के सीने मे उतार दी थी।इस घटना को हुये बरसों बीत गये लेकिन संवेदनशील पुलिस अफसर रहे ए उपाध्याय आज भी डलिया मे रखे बच्ची के शव को याद कर कांप उठते हैं।
योगी सरकार बनने के बाद यूपी पुलिस ने भी अपराध की रोकथाम के लिए एनकाउंटर किये थे।लेकिन क्या यूपी मे अपराध रूक गये ,इसका जवाब अखबारों की सुर्खियां है।यदि केवल 2019 की ही बात करें, तो देश में अकल्पनीय गैंगरेप की कई घटनाएं घटी हैं. बिहार के गया जिले में 15 वर्षीया किशोरी के साथ न केवल गैंगरेप किया गया बल्कि उस का सिर मूंड़ कर उसे गांवभर में घुमाया भी गया। लड़कों के खिलाफ लगाए गए पीडि़ता के आरोपों को गांव के लोगों ने झूठ माना और इसीलिए लड़की का सिर मूंड़ कर उसे गांव में शर्मसार करने के लिए घुमाया गया।नये साल मे भी देश मे बेटियों के साथ हैवानियत जारी है।पश्चिम बंगाल के दिनाजपुर जिले मे एक युवती के साथ गैंगरेप कर उसे जिंदा जला दिया गया।वहीं 2020 की शरूआत मे ही बिहार की राजधानी पटना मे दरिंदों ने एक माल से छात्रा का अपहरण कर गैंगरेप किया।आरोपियों ने रेप का वीडियो भी बना लिया।राजनीति मे उलझे मीडिया के पास इन घटनाओं के कवरेज की फुर्सत नही है।
बहरहाल हम बलात्कार और सजा की ही बात करते है, लेकिन बलात्कार की जड़ क्या है, 80% बलात्कार के मामले किनके साथ होते है। बलात्कार पीड़ितों के साथ समाज, सरकार, पुलिस, डॉ और कानून किस तरह का व्यवहार करता है। ऐसी चर्चा किसी भी अख़बारों और चैनलों मे दिखाई नही देती। क्या यहां पर हमारा, हमारी सरकार, हमारे सिस्टम का दोहरा चरित्र नही दिखाई देता है।नामी-गिरामी आरेपियों को तब तक राहत मिली रहती है जब तक अदालत का दखल नही होता है।उन्नाव कांड मे ही पुलिस रिपोर्ट दर्ज करने के लिए अदालत के दखल देने तक सबूत तलाशती रही। हमारे समाज मे बलात्कारी की तरफ खड़ा होना है या पीड़ित की तरफ खड़ा होना है इसके लिए हम बलात्कारी का स्टेटस, जाति, धर्म देखते है। अगर बलात्कार किसी मजदूर, गरीब या कमजोर ने किया है तो हम भी और मीडिया भी उसको फांसी से कम बात नही करता है और साथ में उसकी पूरी जतमात को भी बलात्कारी साबित करने की कोशिश की जाती है। लेकिन अगर रेप में कोई अमीर, बाबा या नेता शामिल है तो समाज और सिस्टम पीड़ित के ही खिलाफ खड़े मिलते है। कितने ही बाबा है जो बलात्कार के केस में अंदर है या बाहर केस का सामना कर रहे है लेकिन उनके अनुयायियों की सँख्या करोड़ो में है जो इन बाबाओं को बलात्कारी कहने वालों की जान तक लेने केे लिए तैयार है। अब सवाल ये है कि हम बलात्कारियो को किस नजर से देखते है।पीड़ितों की सुरक्षा का इंतजाम क्यों नहीं किया जाता? गरीब, पीड़ित परिवारों को मुकदमा लड़ने कि सहायता सरकार क्यों नहीं देती? सवा लाख से अधिक मामले लंबित क्यों हैं?
कानूनी सख्ती उतनी ही सख्ती से समाज और हर केस में लागू हो, यह जरूरी नहीं।अपराधी, दुराचारी आज धड़ल्ले से बच निकल रहे हैं , ऐसे में समाज में गलत संदेश जा रहा है। आंकड़े बताते है कि देश मे रेप के मामले कम नही हो रहे हैं।अगर सभी रेप केस की बात करें तो 2016 के आंकड़ों के अनुसार 38,947 मामले हुए।यानी हर दिन 107 मामले। 2014 – 2016 में पोस्को एक्ट के तहत ही 1,04,976 मामले दर्ज किए गए।हर साल इसमें लगभग 34 से 35 हजार मामले दर्ज किए गए।रेप के मामलों में बढ़ोतरी के बावजूद अधिकतर राज्य सरकारें उदासीन हैं।महिला सुरक्षा के लिए स्थापित ‘निर्भया फंड’ में से कुछ राज्यों ने जहां नाममात्र की धनराशि खर्च की तो वहीं कई राज्य विभिन्न मदों में एक भी पाई का उपयोग करने में विफल रहे।केंद्र सरकार द्वारा महिला सुरक्षा के लिये गठित ‘निर्भया फंड’ के पैसे खर्च करने में सभी राज्य विफल रहे और कुछ राज्यों ने तो एक पैसा भी खर्च नहीं किया। निर्भया कोष के आवंटन के संबंध में सरकार द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार आवंटित धनराशि में से 11 राज्यों ने एक रुपया भी खर्च नहीं किया। इन राज्यों में महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, सिक्किम, त्रिपुरा के अलावा दमन और दीव शामिल हैं।आंकडे बता रहे हैं कि जब महिला सुरक्षा के लिए धन खर्च करने मे तमात सूबे की सरकारें इतनी कंजूस हैं तो वह जमीनी हकीकत मे कितनी गम्भीर होगी। यौनहिंसा अमानवीय कृत्य होने के साथ ही महिला की गोपनीयता और पवित्रता के अधिकार में गैरकानूनी हस्तक्षेप है।यह महिला के सर्वोच्च सम्मान पर गंभीर आघात है।यौनहिंसा उस के आत्मसम्मान और प्रतिष्ठा को भंग करता है। यह भुक्तभोगी को बदनाम तथा अपमानित करता है।यह अपराध अपने पीछे भयावह सदमे को छोड़ जाता है।शासन व अदालत द्वारा किए गए प्रयासों से इस समस्या का हल नहीं मिल पाएगा।जरूरत है कि हमारा समाज भुक्तभोगियों को अतीत के गर्त से निकाल कर यथार्थ की जिंदगी में प्रवेश कराने की कोशिश करे, जिस से भुक्तभोगी औरत हीनभावना की शिकार न हो सके। नीति, नैतिकता और मूल्यों की बात करने वाला मीडिया भी ब्यूटी, बौडी का प्रदर्शन कर औरत को प्रदर्शन की चीज, भोग्या बताता बनाता है। कन्याभ्रूण हत्या व महिलाओं की उपेक्षा के चलते सामाजिक ढांचे में असंतुलन आ रहा है, इसे संतुलित किया जाए।सैक्स, यौनशिक्षा ही नहीं, नैतिकता की शिक्षा भी दी जाए।बहरहाल उम्मीद की जानी चाहिए कि कानूनी बदलावों का संदेश जितना आगे नहीं गया था, उतना इस सजा का जाएगा। इसके आगे की जरूरत महिलाओं के प्रति समाज की सोच बदलने की है।

शाहिद नकवी

Print Friendly, PDF & Email
Tags:
Skip to toolbar